बडौदा से हम अहमदाबाद गये । माताजी की हिमालय-यात्रा सुखपूर्वक पूर्ण हुई यह जानके ताराबेन को बडी खुशी हुई । अहमदाबाद आकर मैं दामोदरदास, जिससे मेरी भेंट ऋषिकेश में हुई थी, मिलने गया । उनके घर जाने पर पता चला की ऋषिकेश से लौटने के कुछ समय पश्चात उनका देहांत हुआ था । उनकी पत्नी तथा अन्य कुटुंबीजनो के आग्रह से मैं कुछ दिन उनके साथ रहा । उन्होंने मेरी भावपूर्वक सेवा की ।
दिपावली के बाद हम ताराबेन को साथ लेकर सरोडा आये । साबरमती के तट पर स्थित सरोडा अन्य गाँवो की तुलना में अत्यंत साधारण है । गाँव के ज्यादातर लोग अशिक्षित होने के कारण आपसी मतभेद और रागद्वेष से भरे हैं ।
गाँव के लोगो के लिये मेरे जीवन को समजना अत्यंत कठिन था । वे हिमालय के बारे में कुछ जानते नहीं थे । शांति व मुक्ति की कामना से कोई भरी जवानी में हिमालय जाय, ये उनकी समज में नहीं आता था । उनको मेरा पहनावा विचित्र लगा । मेरे बारे में गाँव में तरह-तरह की बातें होने लगी । यहाँ तक की कुछ लोग मुझे देखने के लिये इकट्ठा हुए । शायद मेरे विचार, वाणी और वर्तन को वे पागलपन समझ बैठे । हालाकि इसमें उनका कोई कसूर नहीं था क्योंकि उनकी आध्यात्मिक भूमिका नहीं थी । मेरे दिल में उनके लिये सिर्फ करुणा थी । पूर्वजन्म का रहस्योद्घाटन होने के बाद वर्तमान जीवन का प्रवाह मेरी समज में आ रहा था, इसलिये मन में किसी भी प्रकार की शंका नहीं हुई, रागद्वेष के अंकुर नहीं फूटे और शांति बनी रही ।
सरोडा में कुछ लोग मुझे समजते थे, जिनमें इश्वरलाल पुराणी तथा रमताशंकर प्रमुख थे । दोनों सज्जन उच्च आध्यात्मिक संस्कारों से संपन्न थे और मुझे बचपन से जानते थे । पुराणी महाराज संस्कृत के पंडित थे । वे भागवत, गीता तथा अद्वैत वेदांत के प्रेमी थे और गृहस्थ होने के बावजूद विरक्त की भाँति अपना जीवन व्यतीत करते थे । रमताशंकर संतपुरुषों की श्रध्धापूर्वक सेवा करते थे । रामायण, महाभारत और भागवत जैसे धर्मग्रंथो का पारायण करना उनका नित्यक्रम था । उन्हें भजन-कीर्तन में विशेष अभिरुचि थी ।
सरोडा कुछ दिन रहने के बाद मैं बंबई गया । बंबई आने के लिये नारायणभाई का बडा आग्रह था । सरोडा में माताजी और ताराबेन के अलावा पिताजी के माताजी (दादी) भी थे । उनका नाम सांकुबा था । उनका हृदय निष्कपट और निष्पाप था । पिछले कुछ सालों से उन्हें ठीक दिखाई नहीं पडता था इसलिये माताजी का सरोडा रहेना आवश्यक था । माताजी मेरे साथ रहना चाहती थी किन्तु सांसारिक बंधन के कारण एसा कर पाना संभव नहीं था । ईश्वर की लीला अपरंपार है, वो कब और कैसे संजोग बनाता है वो कोई नहीं जान पाता ।
सन १९४४ का साल मेरे लिये शकवर्ती सिद्ध हुआ । साल के प्रारंभ में दशरथाचल से लौटकर मैं देवप्रयाग आया, वहाँ मैंने कृष्णदर्शन के लिये व्रत रक्खा । वहाँ से मैं टिहरी गया जहाँ वेदबन्धु से मेरी भेंट हुई । टिहरी में स्वामी रामतीर्थ के स्थान पर जाना हुआ । फिर ऋषिकेश, भगवान आश्रम में अज्ञात महापुरुष के दर्शन का दैवी अनुभव मिला । उत्तरकाशी में कुछ बहुमूल्य आध्यात्मिक अनुभव मिले । जमनोत्री की यात्रा में पूर्वजन्म के ज्ञान मिला । चारों धाम की यात्रा संपन्न हुई । ऋषिकेश में माताजी बीमार हुई फिर भी अयोध्या, मथुरा, काशी, वृंदावन की यात्रा पूर्ण करके हम गुजरात लौटे । इसी एक साल के दौरान मुझे अवनवीन अनुभवों की प्राप्ति हुई तथा आत्मिक शांति मिली । अब आगे क्या होगा, ये तो सिर्फ आनेवाला वक्त बता सकता है ।

