आल्मोडा के आश्रम में

लंबे और परिश्रमदायी सफर के बाद मैं देवप्रयाग पहूँचा । हिमालय की उत्तुंग पर्वतमालाओं के बीच आकर मुझे अवर्णनीय आनंद की अनुभूति हुई । अलकनंदा और भागीरथी के संगम-स्थान पर जाकर मैंने स्नान किया । जब शांताश्रम पहूँचा तो नीरव शांति ने मुझे घेर लिया । मैं अपनी दक्षिणेश्वर-यात्रा के बारे में सोचता रहा । पुलिनबाबु से परिचय, संत-महात्माओं से भेंट, सुकुमारी के रूप में माँ का प्रसाद देना, यह सब मेरे मानसपट पर उभरता रहा, फिर मैंने अपने आपको प्रार्थना में जोड दिया ।

मैंने पढा था की रामकृष्णदेव ने विवेकानंद के सर पर हाथ रखके उनको समाधि का अनुभव करवाया था । मुझे एसे ही कोई सिद्ध महापुरुष की तलाश थी । मगर एसे महापुरुष मुझे कहाँ और कैसे मिलें ? हाथ धरके बैठे रहेना मेरा स्वभाव नहीं । जिस लक्ष्य को मैं हासिल करना चाहूँ, उसके लिये जी-जान लगाकर कोशीश करना मेरी फितरत में है । मैंने अपने ध्येय को मध्येनजर रखते हुए घनिष्ठ प्रार्थना का प्रारंभ किया, साथ में तीन दिन का निर्जला व्रत रक्खा ।

यकायक मेरे मन में माँ आनंदमयी के दर्शन की ईच्छा हुई । मैं उन्हें सन १९४३ में देहरादून एवं रायपुर में मिल चुका था । माँ आनंदमयी का एक आश्रम आल्मोडा में था । मैंने सोचा की वहाँ जाकर कुछ दिन रहूँ और फिर वहाँ से कैलास-मानसरोवर जाउँ ।

आलमोडा जाने के लिये मैंने जो दिन निश्चित किया, उसी दिन ध्यानावस्था में मुझे अंतःप्रेरणा हुई, 'आप भले वहाँ जाना चाहे, मगर वो (माँ आनंदमयी) आपको नहीं मिलेगी ।' अब तक मुझे मिले अनुभवों के आधार पर मैं यकीन से कह सकता था की यह प्रेरणा गलत नहीं होगी । जब भी मैं किसी उलझन में फँस जाता था, तब मुझे इसी आवाज ने मेरा मार्गदर्शन किया था । ईश्वर की कृपा से या मेरे पूर्वजन्म के संस्कार के कारण, बचपन से लेकर आज तक मुझे एसी प्रेरणा मिलती रही है । एसी ही आवाज ने मुझे महान योगी बनने की प्रेरणा दी थी, १९४0 में ऋषिकेश में शांति का अनुभव करवाया था, देवकीबाई धर्मशाला का त्याग करने के लिये प्रेरित किया था, तथा अन्य कई महत्वपूर्ण कार्यो में मेरा साथ दिया था । मेरे लिये इसी आवाज का अनुसरण करने में भलाई थी । फिर भी, मैं आलमोडा जाने के उत्सुक रहा ।

सुबह मैंने देवप्रयाग के प्रसिद्ध ज्योतिषी चक्रधरजी को पूछा । ग्रहों का आधार लेकर उन्होंने बताया, 'आप आल्मोडा अवश्य जाओ । वहाँ माता आनंदमयी से आपकी भेंट जरुर होगी । जैसे आप वहाँ जाओगे, माँ आनन्दमयी वहाँ आ पहूँचेगी और आपका मिलाप होगा ।'

अब क्या करुँ, आल्मोडा जाऊँ या न जाऊँ ? मैंने अपने आप को भीतर से टटोला । मेरा मन मुझे कह रहा था की अंतःप्रेरणा के मुताबिक मैं जिसे मिलने जा रहा हूँ वो मुझे नहीं मिलेंगे, मगर उसने मुझे वहाँ जाने-से थोडा रोका है । मैंने सोचा, अगर माँ आनन्दमयी से भेंट नहीं होती तो कोई दिक्कत नहीं, कम-से-कम आल्मोडा के पर्वतीय प्रदेशों को देखने को मौका मिलेगा । और फिर, मन में जो इच्छा का उदय हुआ उसकी पूर्ति हो जायेगी । काफि मनोमंथन के बाद मैं यह नतीजे पर पहूँचा की मुझे आल्मोडा जाना चाहिए ।

देवप्रयाग से बस लेकर ऋषिकेश, ऋषिकेश से हरिद्वार तथा हरिद्वार से ट्रेन लेकर बरेली तथा काठगोदाम, और वहाँ से फिर बस लेकर मैं आल्मोडा पहूँचा । दक्षिणेश्वर से देवप्रयाग आने पर मैंने मौनव्रत रखा था । आल्मोडा की सफर के दौरान यह जारी रहा । मनोहर पर्वतमालाओं के बीच बसे हुए आल्मोडा में जब मेरा प्रवेश हुआ, शाम होने आयी थी ।

आल्मोडा के पर्वत मुझे गढ़वाल से ज्यादा घने और सुंदर लगे । हाँ, यहाँ पर गंगाजी का प्रवाह नहीं था इसलिये उसकी शोभा कुछ फिकी लगी । यहाँ के रास्तें, यातायात की व्यवस्था, मकान और दफ्तरों की सजावट ठीकठाक लगी, मगर शहर इतना स्वच्छ और सफाईदार नहीं लगा । शहर से करीब एक मील की दूरी पर पातालदेवी नामक स्थान में माता आनंदमयी का आश्रम था । वहाँ जाकर मैंने आश्रम के मुख्याध्यक्ष का संपर्क किया । वे एक वृद्ध संन्यासी थे । उन्होंने बताया की माता आनंदमयी पिछले दो सालों से वहाँ नहीं आयी । और, वो कब आयेगी उसके बारे में निश्चित रूप से उन्हें कोई जानकारी नहीं है । देवप्रयाग में मुझे मिली प्रेरणा गलत नहीं थी ।

पातालदेवी का स्थान अत्यंत मनोहर था । चारों ओर पहाडों से घीरे आश्रम की जगह भी शांत और एकांत थी । मागशिर्ष मास चल रहा था, इसलिये ठंड काफि थी । वहाँ मेरी मुलाकात एक युवान परिव्राजक महात्मा से हुई । वे अभी-अभी कैलास-मानसरोवर से लौटे थे । पहली मुलाकात में हमारा आपसी स्नेह-संबंध हो गया । उन्होंने मौनव्रत धारण किया था, मगर आत्मिक संवाद के लिये वाणी की जरुरत नहीं होती । पवित्र प्रेम का तालुक्क अंतरात्मा से साथ होता है ।

आश्रम के कार्यालय में जाकर हमने रहने के लिये पूछताछ की मगर मुख्याध्यक्ष, संन्यासी महाराज ने हमे ठीक-से उत्तर नहीं दिया । मैंने उनको माता आनंदमयी से मेरी कुछ साल पहले हुई भेंट के बारे में बताया । तब जाकर उन्होंने हमारे रहने का और खाने का प्रबंध किया ।

शाम को हमने रसोईये के मधुर कंठ से भजन सुने । रात हुई तो आश्रम की बहेनों ने अपने कंठ से वातावरण को दिव्य कर दिया । भोजनविधि से निवृत होकर हम विश्राम करने गये ।

सुबह में मुख्याध्यक्ष आये और कहने लगे, 'आज आपको यहाँ से निकलना होगा । हमें किसी जगह भोजन के लिये जाना है, इसलिये आज आपके भोजन का प्रबंध नहीं हो सकता । आप से निवेदन है की हम प्रस्थान करें उसके पहले ही आप यह स्थान त्याग दें ।'

मुख्याध्यक्ष का शुक्रिया अदा करके हम निकल पडे । काठगोदाम से ट्रेन में एक संतपुरुष से भेंट हुई । वे अपने भक्तों के साथ कहीं यात्रा करने जा रहे थे । उनका मुखमंडल तेजस्वी, भालप्रदेश विशाल और शरीर कृश था । उन्होंने पीले वस्त्र धारण किये थे । मेरे पास आकर उन्होंने कहा, 'आपके उपर माँ सरस्वती की कृपा है । वो आपकी सर्वप्रकार से रक्षा करेगी ।'

फिर उन्होंने कहा, 'आप अपने उत्तराखंड स्थित आश्रम में जा रहे हैं, वो ठीक कर रहें है । वही स्थान आपके लिये सर्वथा योग्य है ।'

संतपुरुष के इस रहस्योदघाटन से उनकी असाधारण शक्ति का परिचय मिला । मैंने मन-ही-मन उनको प्रणाम किया ।

Today's Quote

That man has reached immortality who is disturbed by nothing material.
- Swami Vivekanand

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