अलौकिक दीक्षा

आल्मोडा से मैं देवप्रयाग तो लौट आया मगर मेरी बेचैनी कम नहीं हुई । ध्येयपूर्ति के लिये मेरी कशिश जारी रही । मैं किसी एसे सिद्ध महापुरुष की तलाश में था जो मेरा पथप्रदर्शन कर सकें, मुझे अपने ध्येय तक पहूँचा सकें । साधना के पथ पर निरंतर चलते रहेना आवश्यक है । एसा करने पर ही सफलता मिलती है । मन अन्य विषयों से हटाकर साधना में लगाना पडता है । एकाग्रता साधक के लिये अनिवार्य रूपेण आवश्यक है । सिद्ध महापुरुषों ने जो भी हासिल किया है, निरंतर साधना करके ही पाया है ।

उन दिनों की बात है । चक्रधरजी ने शांताश्रम की कुटिया में एक कमरा जोडने का निर्णय किया । वे चाहते थे की मैं शांताश्रम के नीचे के कमरे में अपना सामान रखूँ, खाना पकाऊँ और उपर जो नया कक्ष बनेगा, उसका इस्तमाल साधना के लिये करूँ । शांताश्रम की कुटिया वैसे भी छोटी थी । अब काम शुरू हुआ तो वहाँ रहेना संभव नहीं था, इसलिये मुझे स्थानांतर करना पडा । पहाडियों से उतरकर मैं देवप्रयाग आया और मगनलाल के घर पर रहने लगा । यह स्थान साधना के लिये सानुकूल था इसलिये मेरी साधना की गति बनी रही । दिन कब उगता और कब ढलता, इसका पता मुझे नहीं चलता था । दिन का सारा वक्त मैं साधना में व्यतीत करता था । यहाँ तक, की रातभर ध्यान में बैठा रहता था । शांताश्रम के नवसर्जन का काम खत्म होने तक यानि तकरीबन देढ महिने तक मैं मगनलाल के घर में रहा । उसी दौरान मुझे यह अदभूत अनुभव मिला ।

१९ अप्रैल, १९४६ का दिन था । रात को मैं ध्यान करने बैठा । उन दिनों में एकाग्रता होने पर मेरा देहभान चला जाता था । शरीरभाव पुनः आने पर मैं उत्कट प्रार्थना में लग जाता था । एसा करने से शरीरभाव की विस्मृति हो जाती थी । एसा चलता रहता था । मगर आज ध्यानावस्था में मुझे एक अवधूत महापुरुष का दर्शन हुआ, जो की बिलकुल निर्वस्त्र थे । उनके देह पर मक्खियाँ गुनगुना रही थी । मैंने उनको प्रणाम किया । उन्होंने अपना एक हाथ मेरे सर पर रखा । दूसरे हाथ का अंगूठा पीठ के नीचे, मूलाधार चक्र पर लगाया । तुरन्त मेरा शरीरभान चला गया, मुझे समाधिदशा की प्राप्ति हुई । जब मैं जाग्रत हुआ तो उन्होंने अपना अंगूठा हटा दिया । समाधि का यह अनुभव करीब दो-ढाई घण्टे तक चला । एसे अनुभव की मुझे कई दिनों से अपेक्षा थी । ईश्वर ने कृपा करके आज मेरी मनोकामना पूर्ण की । मुझे लगा मानों मुझे अलौकिक दीक्षा मिल गई ।

आँखें खोलकर मैंने कमरे की चारों ओर देखा मगर कोई नहीं था । यह अनुभव ब्राह्ममूहुर्त में हुआ । मैं सोचने लगा की मुझे अलौकिक दीक्षा प्रदान करनेवाले यह सिद्ध महात्मा पुरुष कौन हो सकते हैं ? मैं कभी उनसे मिला तो नहीं था । क्या वे कोई जिवनमुक्त सिद्ध योगी थे ? या फिर ईश्वर ने मेरी सहायता करने हेतु स्वयं उनका रुप धारण किया था ? जो भी हो, इस अनुभव के बाद मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । मुझे लगा की अब मेरी साधना की गड्डी अपने तथाकथित गंतव्य पर अवश्य पहूँचेगी । मुझे ध्यान में आवश्यक मदद मिलेगी । पूर्णता का मेरा स्वप्न साकार हो जायेगा । मैं देश तथा दुनिया के काम आ सकूँगा । मगर मुझे अंदाजा नहीं था की मुझे इस रास्ते पर कितना चलना होगा । वक्त के चलते वो मेरी समज में आता गया ।

यहाँ पाठकों से मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ की आज तक मुझे एसे कई अनुभव मिल चुके हैं, मगर उन सबके बारे में मैंने नहीं बताया है । एसा करना मैं ठीक नहीं समजता । यह अनुभव विशेषतः इसलिये बताया ताकि साधकों को प्रेरणा मिलें, आश्वासन मिले, की हाँ, एसे अनुभव उन्हें भी मिल सकते हैं । यह अनुभव बताकर मुझे आत्मश्लाघा या आत्मप्रसंशा नहीं करनी है । अगर किसी को एसा लगता है तो ये उनकी गलतफेहमी होगी । मेरी अब तक की आत्मकथा पढनेवाले वाचकों को यह बताने की जरूरत नहीं है की यह मैंने केवल लोकहित को मध्येनजर रखते हुए किया है । सिर्फ ईश्वर की ईच्छा के कारण उसे प्रसिद्ध किया है । एसा करने में इश्वर की महिमा का गान है, नहीं की मेरा ।

लंबे अरसे से मेरी यह दिली तमन्ना थी की कोई सिद्ध महापुरुष मुझे दीक्षा दे । मेरी मनोकामना सिद्ध होने पर मैं अति प्रसन्न हुआ । और क्यूँ न हूँ ? कई दिनों के उपवास, अनगिनत प्रार्थना तथा आँसूओं की बौछार के बाद मुझे यह अनुभूति मिली थी । हमारी सभी ईच्छा ईश्वर की कृपा से पूर्ण हो सकती है । हमें केवल पूर्ण श्रद्धा से प्रयास करने चाहिए । ज्यादातर साधक बीच रास्ते में ही भरोंसा खो देतें हैं । फिर, वे साधना का मार्ग गलत है, एसा अभिप्राय देने लगते हैं । एसा करने से साधना की और साधकों की कुसेवा होती है । जो निष्ठावान साधक है, जो अपने प्रयत्नों में जुडा रहता है, उसे प्रभु या तो सिद्ध महापुरुषों की मदद मिल ही जाती है । अपने अनुभव के बलबूते पर मैं यह कह सकता हूँ ।

आपने शायद पढा होगा है की पहले के जमाने में शब्द, स्पर्श या संकल्प से दीक्षा दी जाती थी । सिद्ध महापुरुष साधकों की सुषुप्त शक्ति को जाग्रत करके उसे उच्च भूमिका पर ले जाते थे । क्या आज के जमाने में एसा हो सकता है भला । मगर मेरे अनुभव से आपको विश्वास होगा । हाँ, ये बात है की आजकल एसा कम होता है । उसका एक कारण, तो एसे सिद्ध महापुरुष बहुत कम बचें है तथा दूसरा, अधिकारी साधकों की कमी हो गयी हैं ।

 

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