हनुमानजी का दिव्य दर्शन तथा आत्मदर्शन

नादानुसंधान अपने आप में एक स्वतंत्र साधना है । किसी सिद्ध महापुरुष के द्वारा दीक्षा मिलने पर जागृत अवस्था में नादश्रवण होता है । नाद सामान्य रूप से दाहिने और फिर बायें कान में सुनाई पडता है । शुरु में यह बडे जोरों के साथ सुनाई पडता है, फिर उसकी तीव्रता कम हो जाती है । अंत में सिर्फ दाहिने कान में नादश्रवण चलता है । नादश्रवण से साधना में आसानी होती है । नाद का अनुसंधान करने से मन तुरन्त एकाग्र हो जाता है और समाधिदशा में प्रवेश आसान हो जाता है ।

योग के प्राचीन ग्रंथो में दस तरह के नाद का वर्णन किया गया है । मैं अपने स्वानुभव से इसका समर्थन करता हूँ । भारत में नाथ संप्रदाय तथा कबीर और राधास्वामी संप्रदाय में नादश्रवण को काफि एहमियत दी गई है । उपनिषद में भी नाद का उल्लेख है ।

नादश्रवण के अनुभव मिलने पर मेरे आध्यात्मिक अनुभवों की सूचि में एक अहम चीज का इजाफा हुआ ।

चेल से लौटने के बाद नाद शुरु हुआ था । अब मेरे लिये ध्यान-साधना में एकाग्रता का अनुभव सहज हो गया । इन्हीं दिनों की बात है । वो १७ जून १९४६ का दिन था । मैं सुबह में ध्यान करने के लिये बैठा तो अचानक मेरा देहभान चला गया । इसी अवस्था में मैंने एक मानवाकृति देखी । फिर उसके स्थान पर हनुमानजी प्रकट हुए । उनके दोनों हाथ जुडे हुए थे और दृष्टि मेरी ओर स्थिर थी । उनका मुखमंडल तथा शरीर अत्यंत तेजस्वी और लाल था । बिल्कुल वैसा, जैसा हम तसवीरों में देखते है । उनके दर्शन पाकर मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । हनुमानजी के प्रति मेरा पूज्यभाव बढ गया । उनकी कृपा के बिना एसा दर्शन पाना असंभव है ।
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कुछ ही दिनों में एक और अनुभव मिला । जब मैं देहातीत दशा में था, तो मैंने अपने ही स्वरूप का दर्शन किया । उस वक्त मैं दाढी रखता था, मगर मैंने जो स्वरूप देखा उसमें दाढी नहीं थी । मेरा शरीर अत्यंत तेजोमय और गौर था । मैंने सफेद वस्त्र पहने हुए थे । मैं पद्मासन लगाकर ध्यान में बैठा था । मेरे मुँह पर पूर्ण शांति थी । बाद में मुझे इसी प्रकार के अन्य दो-तीन अनुभव मिले ।

मुझे लगता है की सिद्धपुरुष एसे तेजस्वी और सुक्ष्म शरीर में रहतें होंगे । पूर्णता का अनुभव करने के पश्चात उन्हें दिव्य शरीर की प्राप्ति होती होगी । एसा शरीर, जिसमें न व्याधि हो, न शोक हो, और न मृत्यु हो । सिर्फ पूर्ण शांति, आनंद और अमरत्व की अनुभूति हो । अपने स्वरूप के एसे अनुभव को प्रतीक दर्शन भी कहा गया है ।

साधना के पथ पर एसे तरह-तरह के चित्रविचित्र अनुभव मिलते है । कई अनुभव एसे होते है जिसे लब्जों में बयाँ करना मुश्किल है, क्योंकि यह केवल अनुभव का विषय है । मगर एक बात निश्चित है की साधनापथ के यात्री को निराश होने की आवश्यकता नहीं है । अगर साधना सही ढंग से हो रही है तो अनुभव मिलते रहेंगे । हाँ, अनुभव मिलने पर उसे रुकना नहीं है, ओर आगे चलते रहेना है । तब तक, जब तक वह पूर्णता के अंतिम ध्येय को हासिल नहीं कर लेता । जूठा आत्मसंतोष साधना में सबसे बडी रुकावट है, यह सबको समज लेना चाहिए ।

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