नेपालीबाबा के बारे में बताते हुए मुझे असाधारण हर्ष की अनुभूति हो रही है । नेपालीबाबा का निवास सीमला के बाहर, एकांत में था । सीमला जैसे भोगप्रधान स्थल में उनका रहेना अपने आप में आश्चर्य था । पीछले तकरीबन २०-२५ साल से वे यहाँ रहते थे मगर उन्हें शायद ही कोई पहचानता था । इसका कारण उनकी निस्पृहता, भीड से दूर रहने की वृत्ति और उनका बाह्य रूपरंग था । उनका साफ मुख, लंबाचौडा शरीर, सफेद धोती और खादी का रंगीन खमीस, किसीको भी घोखे में रखने के लिये पर्याप्त था । उनकी आँखे तेजस्वी और मुखमंडल दृढ निश्चय, तीव्र वैराग्य और निरभिमानता से भरा था ।
जब मैंने उनका परिचय पूछा तो उन्होंने उत्तर में कहा: 'सीमला में बहुत सारे साधुसंत आते है मगर मैं किसीको मिलने नहीं जाता । यह पहली दफा है की मैं किसीको मिलने आया हूँ ।'
फिर उन्होंने कहा: 'रात को लामा गुरु ने कहा की यहाँ दो संतपुरुष आये है । उनमें से जो युवा है, वो अवश्य मिलनेलायक है । उन्होंने मुझे यहाँ का पता दिया, तो मैं आपको मिलने चला आया ।'
यह सुनकर जोशीजी ने पूछा, 'आपके लामा गुरु कहाँ रहते है ?'
उन्होंने कहा: 'वे चीन में रहते है मगर उनके लिये स्थल-काल के भेद नहीं है । वे मुझे हररोज दर्शन देते है और वार्तालाप करते है ।'
नेपालीबाबा की बात से हमें अचरज नहीं हुआ, थोडा आश्चर्य जरूर हुआ । हमें पता था की सिद्ध योगीओं के लिये एसा करना नामुमकिन नहीं है । कठिन योगाभ्यास के बाद योगी अपने शरीर और मन पर काबू पा लेता है । फिर वो अपनी मर्जी से कहीं पर भी आ-जा सकता है । साधारण मनुष्य जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकता एसी शक्तियाँ योगी के लिये सहज हो जाती है । ईश्वर की कृपा से मुझे एसे सिद्ध महापुरुषों के दर्शनानुभव मिल चुके थे । कोई भी व्यक्ति विकास की एसी उच्च अवस्था पर पहूँचने की ताकत रखता है । मगर वो विषयसुख को सर्वस्व मानकर इन्द्रियों में फँस जाता हैं । इसलिये उसका पूर्ण विकास नहीं होता । वो सर्वव्यापक, चैतन्य शक्ति के अनुभव से वंचित रहता है ।
मेरे मन में जो विचार चल रहे थे उसकी पूर्ति करते हुए नेपालीबाबा ने कहा : 'संसार में क्या रक्खा है ? संसार के सभी पदार्थ विनाशशील है । मनुष्य उसमें अपने आपको लूटाकर बरबाद हो जाता है । जो सनातन है, पूर्ण है, आनंदस्वरूप एवं कल्याणकारी है, उसकी आराधना वो नहीं करता । इससे विशेष आश्चर्य संसार में और क्या होगा ?'
फिर उन्होंने ज्ञान और वैराग्य की बातें सुनाई । उनकी अस्खलित, मृदु एवं गंभीर अनुभव-वाणी हम सुनते रहें । उनकी संनिधि में एसा माधुर्य था की हमें उठने का मन नहीं होता था । हम मन-ही-मन सोचते की वे बोलते रहे और हम सुनतें रहें । ये मुलाकात कभी खत्म न हो ।
जब हम धरमपुर से निकले थे तो मन में एसी कोई कल्पना नहीं थी । मगर इश्वर की कृपा से हमें एसे महापुरुष मिल गये । सिद्ध महापुरुषों का दर्शन-सत्संग अमूल्य होता है । उसे दुनिया की किसी दौलत के तराजू से तौला नहीं जाता । दुनिया का समस्त वैभव उस आनंद के आगे फिका लगता है । सत्संग से आत्मा जाग्रत होता है, उसे नयी चेतना मिलती है, हृदय परम प्रकाश से भर जाता है ।
हमारे साथ जोशीजी के रिश्तेदार, घर के सदस्य भी नेपालीबाबा की बातों को मन लगाकर सुनने लगे । सीमला में एसी विभूति रहती है उसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी । आज वो खुद चलकर उनके घर आये थे तो वे एसा मौका क्यूँ गवाँयेगें ?
उस दिन देर रात तक नेपालीबाबा बैठे । उन्होंने बहुत सारी बातें की । जब तक हम सीमला में रहें, वे हररोज आते रहे । उनके साथे तकरीबन बीस साल की नेपाली लडकी रहती थी । नेपालीबाबा ने उनके बारे में बताते हुए कहा 'नेपाल के जंगल में हमें ये मिली थी । जब उसे पहली बार देखा था तब उसके पेट में लकडी घुस गई थी । वो बेहोश पडी थी । उसकी हालत देखकर मैंने औषधिप्रयोग किया और उसे दर्दमुक्त किया । फिर मैंने उसे अपने घर जाने को कहा, मगर वो नहीं मानी । उसने मेरे पास रहने की जीद ले ली । आखिरकार उसके सगेसंबंधीओं की रजामंदी से वो मेरे पास रहने आयी । उसकी आध्यात्मिक अवस्था उच्च है । सारी रात वो ध्यान में बैठती है । उसे समाधि का अनुभव मिल चुका है । उसे शादी नहीं करनी है । मेरे पास रहकर वो योगसाधना तथा जडीबुटियों के बारे सीख रही है ।'
नेपालीबाबा जडीबुट्टीओं के प्रखर ज्ञाता थे । हिमालय के विभिन्न प्रदेशों में जो जडीबुटीयाँ होती है, उसका उपयोग कैसे करना, वो उन्हें मालूम था । कभीकभा वे खुद औषधि बनाकर लोगों की सेवा करते थे । जोशीजी को औषधिओं में काफि दिलचस्पी थी । इसलिये बाब हमारे पास एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ लेकर आये, जिसमें विविध औषधि के गुणों का वर्णन था ।
उनकी कुछ बातें अजीब थी । एक दिन उन्होंने कहा: 'मैं अक्सर तिबेट, चीन और नेपाल जाता हूँ । नेपाल मेरा जन्मस्थान है इसलिये सब मुझे नेपालीबाबा कहते है । जब मेरी मरजी पडती है तब मैं निकल पडता हूँ । भूतान की पहाडीयों में कई महान योगी निवास करते है । कुछ महात्मा तो सत्य, त्रेता एवं द्वापर युग के है । उनका आहार वहाँ मिलनेवाली जडीबुटियाँ है । पांचसो से हजार साल की आयु वाले कई महात्मा वहाँ निवास करते है । वे सिर्फ अपनी मरजी से दर्शन देते है । साधारण व्यक्ति को उनके दर्शन नहीं होते । मैं एसे कई योगीओं को मिल चुका हूँ ।
एक दफा पैड के नीचे मुझे महान भक्त, ज्ञानी और योगी श्री कागभुशुंडजी के दर्शन हुए थे । मैंने आजतक यह बात किसीको नहीं बताई । क्योंकि कोई मेरी बात पर यकीन नहीं करेगा । आप अधिकारी है, मेरी बात समज सकते हैं, इसलिये आपको बता रहा हूँ ।'
नेपालीबाबा ने कई दफा कैलास-मानसरोवर की यात्रा की थी । उन्होंने कहा : 'जब मैं देवप्रयाग आउँगा तो हम साथ में कैलास की यात्रा करेंगे । तब मैं आपको सिद्ध योगीओं के दर्शन कराउँगा । आपको बडी प्रसन्नता होगी ।' हाँलाकि नेपालीबाबा अभी तक देवप्रयाग नहीं आये ।
उनकी बताई हुई एक ओर बात का उल्लेख करके मैं यह प्रकरण की समाप्ति करूँगा । उन्होंने कहा, 'आखिरी सीमला परिषद के वक्त सुभाषचंद्र बोझ और हीटलर – दोनों भेष बदलकर यहाँ आये थे । मैंने उन्हें पहचान लिया और कहा की आपको पुलिस ढूँढ रही है । आप यहाँ से अफधानिस्तान की ओर निकल पडो । फिर दोनों सीमला छोडकर निकल गये थे ।'
यह बात में कितना तथ्य है, यह हमें तय करना है । हाँ, एक बात सभी लोग जानते हैं की भारत सरकार की घनिष्ठ तपास के बावजूद सुभाषचंद्र बोझ का अभी तक पता नहीं चला है । लोग उनके जिन्दा होने की उम्मीद खो बैठे है ।

