सन १९४७ के जुलाई मास में मैं दशरथाचल गया । दशरथाचल शांत, सुंदर एवं एकांत जगह है । वहाँ कोई व्यक्ति नहीं रहता । घना जंगल और सामने दिखाई देनेवाली अर्धवर्तुलाकार बर्फिली चोटीयाँ दशरथाचल के विशेष आकर्षण है । ऋषिकेश का त्याग करने के बाद जब मैं पहली दफा यहाँ आया था तो मुझे यहाँ शांति मिली थी । इसलिये मैं दशरथाचल को तीर्थ मानता हूँ । और क्यूँ न मानूँ ? जहाँ तप-साधना करने से शांति मिले, जहाँ अंतरात्मा परमानंद का अनुभव करे, वही सबसे बडा तीर्थ है । इसलिये दशरथाचल मेरे लिये किसी तीर्थधाम से कम नहीं था । वैसे तो दशरथाचल देवप्रयाग के करीब है मगर ज्यादातर यात्रीओं को उसके बारे में पता नहीं है । इसलिये कोई वहाँ आता-जाता नहीं है ।
दशरथाचल पर सबसे बडी तकलीफ पानी की है । पानी के लिये एक-ही झरना है, जो काफि दूरी पर है और उसमें पानी बहुत कम आता है । यहाँ रहने के लिये आवश्यक खाद्यसामग्री साथ में लाना जरूरी है । मेरा सामान उठाने के लिये किसी व्यक्ति की आवश्यकता थी । कोटि गाँव का रामेश्वर मेरे साथ चलने को राजी हुआ इसलिये मेरा काम आसान हो गया । रामेश्वर का सेवाभाव असाधारण था ।
दशरथाचल पर जाकर मैंने मौनव्रत धारण किया । रामेश्वरने बडी महेनत से तूटेफूटे मकान की मरम्मत करके, उसे रहनेलायक बनाया । वर्षाऋतु चल रही थी इसलिये आसपास का नजारा देखनेलायक था । चारों ओर कोहरा छा जाता था । पहाड की चोटी भी दिखाई नहीं पडती थी । हमें लगता की मानो हम स्वर्गलोक में आ गये है ।
एक दिन ऐसा हुआ की जारों-से बारिश हुई और खाने का सामान तकरीबन खत्म हो गया । रामेश्वर ने नीचे के गाँव में पीसने के लिये गेहूँ दिये थे । अब बारिश में जाकर आटा कैसे लाया जाय ? हमारे पास केवल मुँग की दाल बची थी । दाल पुरानी हो चुकी थी मगर ओर कोई चारा नहीं था । रामेश्वर ने दाल तो पकाई मगर इतनी बेस्वाद थी की हमसे खायी नहीं गई । दूसरे दिन नीचे के गाँव में जा सके । आटा मिलने पर खाने का इन्तजाम हो पाया ।
दशरथाचल पर मुझे त्रैलंग स्वामी तथा बंगाली महात्मा के दर्शन हुये । दोनों सिद्ध महापुरुष थे । बंगाली महात्मा ने दशरथाचल पर्वत पर करीब छ माह निवास किया था और देवप्रयाग के पास अपने शरीर का समाधि द्वारा परित्याग किया था । उन्होंने कहा था की दशरथाचल पर जो मेरे दर्शन की कामना करेगा, मैं उसे अवश्य दर्शन दूँगा । मेरे लिये उनका यह वचन सत्य साबित हुआ ।
दशरथाचल पर साधना तीव्र गति से होती रही । एक दिन मुझे अंतःप्रेरणा मिली की अश्वीन मास में मुझे सिद्धि मिलेगी और इसके लिये मुझे शांताश्रम जाना होगा । यह अनुभव मिलने पर मैंने दशरथाचल से देवप्रयाग जाने का निर्णय किया । शांताश्रम में आकर मुझे असाधारण आनंद, संतोष और उत्साह का अनुभव हुआ । मुझे लगा की अब मेरी सभी यातना, चिंता, और कष्ट का अन्त होगा । इश्वर ने मुझे अब तक निराश नहीं किया था इसलिये मेरा आत्मविश्वास बना रहा ।

