जगदंबा के साक्षात दर्शन - २

माँ जगदंबा के दर्शन मिलने पर ही अनशन समाप्त करने का मेरा निश्चय था । दिवाली का दिन प्रतीक्षा में भी चला गया । १३ नवम्बर, गुरुवार को नूतन वर्ष था । उपवास से शरीर अत्यंत कृश हो गया था । सुबह जब मैं आसन जमाकर सोच रहा था की अनशन को काफि दिन हो गये, अब क्या किया जाय । तभी माँ की मधुर आवाज गूँज उठी ।

माँ ने कहा : 'कुछ दिन योगाभ्यास में ओर लगो ।'
मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने कहा : 'कुछ दिन रोक लूँ ?'
'नहीं, ओर लगो ।'
'कुछ दिन ?'
'नहीं, मैंने कहाँ कहा की रोक लो ? अभी योगाभ्यास में कुछ दिन ओर लगो ।'

माँ का स्वरूप नहीं दिखाई दिया मगर उनके सुधासभर शब्द स्पष्ट रीत से सुनाई पडे । नूतनवर्ष के शुभ दिन, प्रातःकाल में माँ का अनुग्रह होने-से मुझे लगा की मेरे पर माँ की कृपादृष्टि है । फिर भी तसल्ली नहीं हुई क्योंकि माँ के दर्शन नहीं हुए ।

योगाभ्यास करके मैं क्या करूँगा ? योगाभ्यास करने से जो मिलता है वो माँ की कृपा-से वैसे ही मिल जायेगा । माँ की आवाज सुनकर मैं भावुक हो जाता हूँ तो माँ के दर्शन से समाधि क्यूँ नहीं होगी ? योगाभ्यास माँ के दर्शन से अधिक नहीं, फिर माँ ने योगाभ्यास करने को क्यूँ कहा ? क्या एसा कहकर माँ मेरी परीक्षा कर रही है ?
रात को एक सुंदर स्त्री का दर्शन हुआ । उसने कहा, नवमी के दिन आपको माँ के दर्शन हो जायेंगे । तब आप भगवान शंकर के स्थान में होंगे । इससे मुझे आश्वासन मिला । उन दिनों में मिलनेवाला हरेक अनुभव मेरे लिये बेहद कीमती था ।

१४ नवम्बर को भाईबीज थी । मध्यरात्री के बाद मेरा देहभान चला गया । जब जाग्रत हुआ तो मुझे माँ के दर्शन हुए । माँ ने रेशमी वस्त्र धारण किये थे । उनकी शोभा देखते ही बनती थी । माँ ने मेरे शरीर पर हाथ फेरकर कहा : 'सबकुछ दे दिया । केवल संकल्प से कार्य सिद्ध होंगे ।' फिर मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहा: 'मैंने कुंडलिनी का मार्ग ठीक कर दिया है । अब फिकर करने की कोई बात नहीं है ।'

माँ के दैवी स्वरूप का वर्णन कैसे करूँ ? उसकी आवश्यकता भी क्या है ? मेरे शरीर का भान आने पर मुझे माँ के दर्शन होते थे, माँ के साथ बात होती थी और फिर मैं समाधिस्थ हो जाता था । फिर देहभान लौटने पर माँ के दर्शन होते थे, फिर समाधि । एसा चलता रहा । मेरी आँखो से खुशी के आँसू बह रहे थे । माँ ने फूलों की माला पहनायी, दोनों हाथ में माला बाँधी । तब मुझे खयाल आया की कोशीश करने पर मेरे हाथ-पैर हिल नहीं रहे, मानो मैं अचल हो गया हूँ । मैं सोच में पड गया की अब मैं कभी उठ पाऊँगा या नहीं ? किसी ओर से बातचीत कर पाऊँगा या नहीं ? सुबह में अगर कोई मिलने आया तो कुटिया के द्वार कैसे खोलूँगा ? समाधि की एसी अवस्था के बारे में मैंने पढा था और मैं चाहता भी था की मुझे एसा अनुभव मिले । माँ ने इसलिये एसा अनुभव करवाया होगा । माँ शायद बताना चाहती है की एसी अवस्था का अनुभव करके देख लो । क्या एसी अवस्था पसंद है ?

मुझे लगा की एसी अवस्था कुछ देर के लिये ठीक हो सकती है मगर हमेशा के लिये नहीं । माँ का अनुग्रह मिले यह इच्छनीय है मगर हमेशा के लिये शून्यमनस्क होकर पडे रहना ठीक नहीं है । जागृति आवश्यक है, आशीर्वादरूप है । मैं जाग्रत दशा में कर्म करता रहूँ और ध्यान माँ में रहे, मन निर्लेप रहे – ये बहेतर है । कुछ वक्त के बाद जब मेरा देहभान लौट आया और मैं अपने हाथ-पैर हिला सका तब मुझे कितना सुकून मिला होगा उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते ।

माँ की कृपा के लिये मैंने व्रत-अनशन रक्खा था । सोचा था की जब तक माँ के दर्शन नहीं होते, मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा, केवल पानी लूँगा । आखिरकार मेरी मनोकामना पूर्ण हुई, मुझे माँ के दर्शन हो गये । कोई अन्य साधक एसा अनुभव मिलने पर अपने आपको बडभागी मानता और वहीं रूक जाता । मगर माँ की कृपा से मैं रुका नहीं । पूर्णता का लक्ष्य अभी सामने था और निर्धारित लक्ष्य हासिल करने तक चैन-और-आराम से सोना मेरा स्वभाव में नहीं । इसलिये मैंने अनशनव्रत तो पूर्ण किया मगर अपने प्रयास जारी रक्खें । माँ के साक्षात दर्शन से मेरा हौसला बुलंद हुआ, मुझे बेहद खुशी मिली । ईश्वर के साक्षात दर्शन की बात अब तक मैंने केवल ग्रंथो में पढी थी । अब प्रत्यक्ष अनुभव मिलने पर मेरा जीवन धन्य हो गया ।

शांताश्रम में कुछ और दिन रहने के बाद दिसम्बर की आँठवी तारीख को मैंने देवप्रयाग को अलविदा कहा । मेरी उम्मीद की नैया नौवी तारीख पर टिकी थी ।

Today's Quote

I know God will not give me anything I can't handle. I just wish He wouldn't trust me so much.
- Mother Teresa

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