जगदंबा के साक्षात दर्शन - १

उसी दिन-से मेरे साधना-यज्ञ की शुरुआत हुई । ये कितने दिन, महीने या साल चलेगा, इसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था । जिसे कुछ हासिल करना है, उसे उसकी परवाह नहीं होती । उसे तो अपना सबकुछ दाव पर लगाना होता है । एक दिन, दो दिन, तीन दिन ... एसे करके नवरात्री के नौ दिन समाप्त हो गये । मैंने मौनव्रत रखा था, इसलिये सारा दिन प्रार्थना करता रहा । मेरी श्रद्धा हिमालय की तरह अचल थी । मुझे माँ की करुणा पर पूरा भरोसा था । माँ के आशीर्वाद से मेरे जैसा साधारण बालक साधना की हिंम्मत जुटा पाया था ।

सुबह में स्नान करने के लिये जब मैं नीचे उतरता तो चारों ओर फैली पहाडीयों के बीच माँ का सुमिरन करते हुए भावविभोर हो जाता था । फिर दिन का पूरा वक्त कुटिया में बैठा रहता था । माँ के दर्शन की दिल में अजीब बैचेनी थी । मेरा रोमरोम उसके लिये बेताब था । एक एक पल मेरे लिये युग समान थी । प्रातःकाल से माँ के मधुर मुखारविंद के दर्शन की कामना लेकर आसन जमाता था । जब स्नान करने जाता, तब केवल पाँच धूँट पानी पीता था । फिर पूरा दिन कुछ भी नहीं लेने का नियम था ।

नवरात्री शुरु हुई तो आश्रम के सामनेवाली पहाडी पर बसे ब्राह्मिन परिवार ने अनशन की बात सुनकर पेंडे भेजे । उनकी आर्थिक स्थिति बिलकुल साधारण थी फिर भी सेवाभाव से उन्होंने एसा किया था । मैं केवल पानी पर अनशन कर रहा था इसलिये पेंडे वैसे ही पडे रहे । शायद चौथे या पाँचवे दिन ऋषिकेश के एक परिचित भाई फल और मिठाई लेकर मुझे मिलने आये । उन्होंने सोचा की व्रत की समाप्ति होने पर मैं उसे ग्रहण करूँ । मगर मेरा अनशन चलता रहा । कुटिया का स्थान एकांत में था, इसलिये कोई वहाँ आता-जाता नहीं था । फल और मिठाई, सबकुछ पडा रहा । आखिरकार बिगड जाने से उसे फैंकना पडा । कुछ चिज, जो अनशनव्रत की समाप्ति के बाद अच्छी रही थी, उसे मैं इस्तमाल कर सका । ये सब बताने का मेरा मतलब है की पास में खाद्यपदार्थ होने के बावजूद व्रत चलता रहा । एसा करना कठिन है, मगर माँ की कृपा से मैं अपने निर्धार में अडीग रह सका ।

माँ कृपालु है, दयालु है । उसकी कृपा के लिये जो भी कोशीश करता है, उसे जरूर शांति मिलती है । नौ दिन तक मैंने तपस्या की । संकट और वेदना के बावजूद मेरा उत्साह कम नहीं हुआ । जरूरत पडने पर शरीर समाप्त कर देने की मेरी तैयारी थी । मगर उसके पहले माँ ने अपने अनुग्रह का परचा दिया ।

२५ अक्तूबर शनिवार के दिन एक अलौकिक अनुभूति मिली । ब्राह्ममूहुर्त में जब मैं ध्यान करने बैठा तो मेरा देहभान चला गया । उसी अवस्था में मैंने दो असाधारण सौंदर्यवान स्त्रीयों को देखा । धीरे धीरे वे अदृश्य हो गयी । फिर बालस्वरूप धारण किये हुये तीन सनकादि ऋषिवरों के दर्शन हुये । मैंने उनको कहा, आप स्वयंसिद्ध हो, मुझे रिद्धि-सिद्धि-ऐश्वर्य तथा अष्ट सिद्धि, नव निधि का दान करो । मैं भारत माँ के काम आ सकूँ, विश्व में शांति की स्थापना में अपना सहयोग प्रदान कर सकूँ, इसके लिये आशीर्वाद दो ।

उन्होंने कहा 'तथास्तु । आपको रिद्धि-सिद्धि मिलें । आपकी सभी मनोकामना पूर्ण हो । आपका मंगल हो । आपका यश बढें ।' और वे अदृश्य हो गये ।

इस अनुभूति के बाद मेरा देहभान लौट आया । मैंने चिडीयों की किलकार सुनी । शांता नदी का सुमधुर स्वर सुना । मेरा अंतर नाच रहा था । जय हो ! हिमालय के सिद्ध महापुरुषों की जय हो ! साधकों की सहायता करनेवाले महापुरुषों की जय हो !

मगर इस अलौकिक अनुभूति मिलने पर भी मैं असंतुष्ट रहा क्योंकी माँ के दर्शन नहीं हुए । मुझे माँ की स्नेहसरिता में स्नान करना था । इसलिये माँ के मंदिर के मंगलद्वार पर मेरी पुकार जारी रही । 'माँ, कब तक मुझे तडपाओगी । अब तो फैंसला होकर रहेगा । मैं बीच रास्ते रुकनेवाला नहीं हूँ । आपके दिव्य मधुर दर्शन मिलने पर ही मुझे शांति होगी । कृपया मुझे मत तडपाओ । जल्द से जल्द आकर मुझे अपने दर्शन दो । मुझे तडपाने में आपको मजा आता है ? आप तो दयालु हो, कृपालु हो, सारे जग की माता हो ।'

अनशन के बीच मैंने पानी लेना भी छोड दिया । दिनरात एक ही आसन पर बैठकर माँ की प्रार्थना करता रहा । जब माँ ने कहा की जल ग्रहण करो, मैं एक-दो दिन में दर्शन देती हूँ, तब जाकर मैंने पानी लेने का निर्णय किया, मगर सिर्फ पाँच घूँट ।

उन दिनों में अक्सर भजन की पंक्तियाँ सुनाई पडती थी, जिससे प्रेरित होकर मैं भजन लिखता था । कभीकभा उपदेश-वाक्य सुनाई पडते थे, तो मैं उसे लिपिबद्ध कर लेता था । कुछ नये मंत्र भी सुनाई दिये, अपरिचित सिद्ध महापुरुषों के दर्शन हुए । इनमें जो आवाज आज तक मेरे कानों में गूँज रही है, वो है माँ के सुमधुर स्वर में सुनी हुई पंक्तियाँ :
तुम बिन रह ना सकूँ कभी मैं, तुम तो मेरे भूप ।
पागल मेरे स्वरूप, पागल मेरे स्वरूप, पागल मेरे स्वरूप ॥

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God, grant me the serenity to accept the things I cannot change, the courage to change the things I can, and the wisdom to know the difference.
- Dr. Reinhold Niebuhr

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