Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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साबरमती से राजकोट होकर हम बंबई आये । बंबई में मुझे दो विशेष अनुभव मिले ।

एक दिन आंतरजगत में प्रभु की दैवी शक्ति - रिद्धि और सिद्धिने कुमारी वेश धारण करके सूर्य से निकलकर मुझमें प्रवेश किया । क्या एसी शक्तियाँ सचमुच सूर्यलोक में निवास करती है ये प्रश्न यहाँ गौण है । इस अनुभव से मुझे हर्ष हुआ मगर मेरा दिल एसे अनुभवों के लिये लालायित नहीं था । मुझे तो जगदंबा की परिपूर्ण कृपा या पूर्णता की अंतिम सिद्धि का इन्तजार था । अब तक मुझे विविध प्रकार के आध्यात्मिक अनुभव मिल चुके थे इसलिये इस अनुभव से विशेष आश्चर्य नहीं हुआ । हालाकि एसे अनुभव बहुत कम साधकों को मिलते है, यह भी सच है । ध्यानावस्था में कोई सिद्धपुरुष या देवीदेवता का दर्शन होने से या समाधि का आभास होने से ज्यादातर साधक यह मानने लगते है की वो सिद्ध हो गये है । वो दूसरों का उद्धार करने और स्वयं गुरु बनने के चक्कर में पड जाते है । साधना का यह सबसे बडा भयस्थान है । उनको याद रखना होगा की दूसरों का उद्धार करने से पहले खुद का उद्धार करना आवश्यक है । सबसे पहले स्वयं को अपूर्णता, अशांति, भय, भेद आदि बंधनो से मुक्त करना है, फिर किसीको मुक्त करने के प्रयास करने है । आध्यात्मिक अनुभवों से साधक की परीक्षा होती है । परमशांति, मुक्ति या पूर्णता का प्रवासी अगर इसे अपना गंतव्य मानकर रुक जाता है तो वो उसके लिये आत्मघात होगा । आध्यात्मिक अनुभवों से साधक की श्रद्धा बुलंद होनी चाहिये, उसे अधिक उत्साह और जोश के साथ साधना में जुडना चाहिये ।
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बंबई आये तो आलंदी जाने का खयाल मन में आया । एक आशा थी की ज्ञानेश्वर महाराज कृपा करके दर्शन दे और साधना की पूर्णता का निश्चित दिन बता दें । रात को स्वप्न में आदेश मिला, 'रात्रीनिवास गाँव में नहीं मगर मंदिर में करना ।' इससे मुझे लगा की इस बार ज्ञानेश्वर महाराज अवश्य कृपा करेंगे ।

बंबई से मेरे साथ माताजी के अलावा विठ्ठलभाई, नारायणभाई तथा अन्य चार भक्तजन थे । आलंदी के बारे में क्या बताउँ ? यह वही स्थान है जहाँ महान सिद्धपुरुष ज्ञानेश्वर ने जन्म धारण किया था, ज्ञानेश्वरी गीता की रचना की थी, कई चमत्कार करके २२ साल की छोटी उम्र में जीवंत समाधि ली थी ।

स्नानादि से निवृत्त होकर हम मंदिर गये । हमारा रात्रीनिवास मंदिर में था । मैंने ज्ञानेश्वर महाराज के चरणों में भावनाओं का अर्घ्य दिया -
'हे ज्ञानेश्वर महाराज,
तमारुं होय खरेखर साच (२)
सजीने बधो साज, मने तो दर्शन आपो आज !
हे ज्ञानेश्वर महाराज !'

'हे ज्ञानेश्वर महाराज ! मैं बडी आशा लेकर आपके द्वार पर आया हूँ । आपकी स्तुति कर रहा हूँ । अगर आप सचमुच यहाँ है, तो मूर्ति से बाहर निकलकर मुझे दर्शन दो और मेरा सत्कार करो । हे ज्ञानेश्वर महाराज ! आपकी जयजयकार हो !'

समाधि मंदिर में दिनरात कीर्तन होता है । पूर्णिमा के दिन रात्री की नीरव शांति में मंदिर भव्य लग रहा था । हाथ में इकतारा और करताल लेकर एक गायक मंदिर के बीचोबीच भजन गा रहा था । जहाँ दिनरात भजन-कीर्तन होता है, वहाँ रहना अपने आप में सौभाग्य है ।

रात का वक्त था । मेरी आतुरता उसकी चरमसीमा पर थी । मैं कब निद्राधीन हो गया ये मुझे पता नहीं चला । मधरात के बाद ज्ञानेश्वर महाराज ने मुझे दर्शन दिया । मेरे हाथ में फूल देकर उन्होंने कहा, 'इस बार देवप्रयाग में आपका काम हो जायेगा । आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है ।'

उनके आशीर्वाद से मुझे बेहद खुशी हुई । अगर ज्ञानेश्वर महाराज ने स्वयं प्रकट होकर ये आशीर्वाद दिया होता तो मैं अपने आपको धन्य और कृतार्थ समजता । फिर भी उन्होंने मेरे लिये जो स्नेह व्यक्त किया था उसे मैं कैसे भूल सकता हूँ ? सिद्धपुरुष क्या नहीं कर सकते ? हमें केवल उनमें भरोसा होना चाहिये । दृढ विश्वास साधना के लिये अत्यंत आवश्यक है ।

अपनी समाधि के तकरीबन तीन सौ साल बाद उन्होंने महात्मा एकनाथ को स्वप्न में दर्शन देकर आज्ञा की थी 'जहाँ मैंने समाधि ली है, वहाँ एक पैड की शाखा मुझे बाधा पहूँचाती है । तू आलंदी आकर उसे ठीक कर ।' इसके बाद एकनाथ महाराज आलंदी गये थे और ज्ञानेश्वर महाराज के साथ तीन दिन रहे थे । यह बात सुप्रसिद्ध है मगर इस पर यकीन करने के लिये श्रद्धा चाहिये, विश्वास चाहिये । अब भी एसा हो सकता है । मेरे अनुभव उसकी गवाहीरूप है । मुझमें कोई विशेष योग्यता नहीं है, फिर भी सिद्धपुरुषों एवं माँ ने मुझ पर कृपावर्षा की है । तो फिर जो सुयोग्य और साधनारत है, उस पर कृपा क्यूँ नहीं होगी ?

हे मानव ! तूने विषयों में अपने मन को डूबो दिया । धन, कीर्ति और भोगोपभोग में अपना कीमती जीवन बरबाद कर दिया । अगर इससे दसवें हिस्से की महेनत इश्वर के लिये की होती, अपना चित्त ध्यान, धारणा या सुमिरन में लगाया होता तो तू अमर हो जाता । हमेशा के लिये सुखी और इश्वरतुल्य हो सकता था । ज्ञानेश्वर, शुकदेव, शंकराचार्य या एकनाथ जैसे महापुरुषों की तरह स्वयं मुक्त होकर दूसरों को मुक्ति की राह दिखा सकता था । अब भी वक्त है । अब भी तू प्रयास करेगा तो एसी कोई चिज नहीं है जो इस शरीर के माध्यम से और इश्वरकृपा से हासिल नहीं कर सकता ।

जिस दिन ज्ञानेश्वर महाराज ने आशीर्वाद दिया वो दिन था सोमवार, ३ अप्रैल, १९५० का । इसके बाद बंबई में ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ, सोपान और मुक्ताबाई – ये चारों भाईबहन ने मुझे आंतरजगत में पुनः दर्शन दिया । महापुरुषों का दर्शन अमोघ होता है । ज्ञानेश्वर महाराज की जय हो !