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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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पिछले कुछ साल से माँ के साक्षात दर्शन या माँ की पूर्ण कृपा के दिन मिलते थे, मगर मिथ्या साबित होते थे । इससे मैं परेशान हो गया था । मुझे यकीन था की एक-न-एक दिन माँ की कृपा हो के रहेगी । मुझे लगता था की कोई सिद्ध महापुरुष मुझे मिलें तो मैं उनको इसके बारे में पूछूँ । वो मुझे कोई निश्चित समय बता दें, तो मेरा काम आसान हो जाय, मेरी बैचेनी का अन्त हो जाय । मैं किसी सिद्ध महापुरुष के दर्शन-समागम के लिये तरस रहा था । माँ को इसके लिये प्रार्थना भी करता था ।

मगर एसे महापुरुष मुझे कहाँ मिलेंगे ? तुलसीदास ने कहा है की 'सकल पदारथ है जगमांहि ।' मतलब, जगत में सभी प्रकार के पदार्थ उपलब्ध है । इस हिसाब से जगत में सिद्ध महापुरुष भी होने चाहिये और जो सच्चे मन से उन्हें मिलना चाहे, उसे वो मिलने चाहिये । इश्वर या अपने इष्ट पर भरोंसा करके जो साधक साधना करते है, एसे संनिष्ठ साधकों के आगे सिद्ध महापुरुष स्वयं प्रस्तुत होते है और उनका मार्गदर्शन करते है ।

मैं जब नवरात्री का व्रत कर रहा था, उन्हीं दिनों की बात है । बंबई के एक स्नेही भाई शिरडी सांईबाबा के दर्शन करने गये । लौटने पर उनका खत आया, जिसमें उन्होंने सांईबाबा के महिमा की बात लिखी थी । खत पढकर मुझे अपनी शिरडी-यात्रा का स्मरण हुआ । फिर मन में विचार दृढ होता गया की मेरी समस्या का समाधान सांईबाबा कर सकते है । मैंने माँ को प्रार्थना के जरिये ये बात बताई । इसके फलस्वरूप सांईबाबा के साथ रिश्ता जुडा और वक्त के चलते दृढ होता गया ।

सांईबाबा के अनुभव कब और कैसे मिलते थे, यह जाननेलायक है । उन दिनों रात को साडे तीन-चार बजे तक मेरी प्रार्थना चलती थी । थकान लगने पर मैं कुछ देर विश्राम करने लेट जाता था । तभी जोरों से नादश्रवण सुनाई पडता था । इससे एक प्रकार की समाधि का अनुभव होता था, देहभान चला जाता था । दस-पंद्रह मिनट के बाद देहभान लौट आता था । इसके दौरान मुझे कई अनुभव मिलते थे । एख दफा आसो वद बारस की रात को मैं प्रार्थना कर रहा था । मैंने सांईबाबा को कहा की आप भक्तों को सहायता करने के लिये हमेशा तैयार रहते हो । मैं भी आपका प्रेमी, प्रसंशक और भक्त हूँ । लोग आपकी महिमा का गुणगान करते नहीं थकते । अगर ये सच है, तो आप मुझे साक्षात दर्शन दो और माँ का दर्शन कब होगा यह मुझे बताओ । प्रार्थना करते-करते मैं तंद्रा में चला गया और इसी अवस्था में सांईबाबा ने दर्शन दिया ।

एक दफा रात को साडे तीन बजे के करीब जैसे मैं आराम करने के लिये लेटा, नादश्रवण के साथ समाधि का अनुभव हुआ । उन दिनों में एसा अक्सर होता था । एसी दशा दस-पंद्रह मिनट या ज्यादा से ज्यादा आधे घण्टे तक रहती थी । मैंने देखा की एक बडा मकान है । मैं सांईबाबा को ढूँढ रहा हूँ । दो-तीन स्त्रीयाँ एक हॉल में प्रवेश करती है । मैं उनके पीछेपीछे जाता हूँ । अंदर जाकर देखता हूँ तो कक्ष में उच्च आसन पर सांईबाबा बिराजमान है । उनका स्वरूप कुछ भिन्न लगता है । मैं जाकर उनको प्रणाम करता हूँ और कहता हूँ की आप अपने मूल स्वरूप में मुझे दर्शन दे । एसा कहने पर उनकी दाढी-मूछ और सर पर कपडा दिखाई देता है, वैसे ही जैसे तसवीरों में होता है । फिर मैं उनको कहता हूँ की मुझे आशीर्वाद दो की मेरा काम बन जाये । वो मेरे सर पर हाथ रखते है और गले में माला पहनाते है । कुछ बातचीत होती है और मेरा देहभान लौट आता है ।

नवरात्री के बाद सांईबाबा के विशेष अनुभव मिलते रहे । मुझे लगा की जगदंबा की इच्छा से ही सांईबाबा के साथ मेरा संपर्क हुआ है । ये मेरे लिये अत्यंत खुशी की बात थी । इसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है, क्योंकि ये सिर्फ अनुभव की बात है ।

 

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