गंगातट पर स्थित भरतमंदिर का स्थान साधना के लिये सभी प्रकार से योग्य था । यहाँ से हिमालय की हरीभरी वादीयों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता था । न जाने क्यूँ, गंगा और हिमालय को देखकर मुझे एसा लगता है की वो मेरे चिरकालिन साथी है । मैं बंबई में पढता था तब-से मेरा सपना था की मैं हिमालय जाउँ । मगर विद्यार्थी अवस्था का यह सपना सच होगा, हिमालय की पुराणप्रसिद्ध ऋषिमुनिसेवित भूमि में मुझे रहने का मौका मिलेगा तथा यहाँ साधना करके मैं अवनवीन अनुभवों की प्राप्ति करूँगा, ये कहाँ सोचा था ?
सच पूछो तो मेरा समस्त जीवन इश्वर की कृपा का परिणाम है । बचपन में उसने मेरा हाथ थामकर मुझे सरोडा से बंबई लाकर रख दिया था । फिर मोहमयी बंबई नगरी में मेरी देखभाल की थी, और मेरे लिये निर्धारित मार्ग पर कदम रखवाये थे । मेरे लिये कौन सा साधन उपयुक्त है ये बताकर मुझे साधना करने की सोच दी थी । ये उसकी कृपा थी की मैं साधनापथ पर कभी निराश नहीं हुआ । जब कभी भी चिंता हुई, तो उसने उसे टिकने नहीं दिया ।
पीछले देढ महिने से हो रहे अनशन के कारण मेरा शरीर कमजोर हो गया था । सर्दी की मौसम शुरु हुई थी । ठंड धीरेधीरे बढती जा रही थी । माँ की रजामंदी के कारण मैंने अनशन जारी रक्खे थे । साधना के लिये संयोग अनुकूल हो तो इसका हो सके इतना फायदा उठाना साधक का कर्तव्य है । गंगाजी का तट, हिमालय की गोद, भरत मंदिर का पवित्र स्थान और अच्छी मौसम – साधना के लिये इससे बढिया संयोग हो ही नहीं सकता । इसमें मुझे मिल रहे विविध अनुभवों से मैं काफि उत्साहित था । मेरी इच्छा जाग्रत अवस्था में सांईबाबा के दर्शन करने की थी ।
माँ की कृपा से यह कामना भी पूरी हुई । कारतक सुद ग्यारस और बारस के दिन मैंने उपवास रक्खा था । ग्यारस को रातभर मैंने माँ और सांईबाबा से प्रार्थना की । मै चाहता थी सांईबाबा मुझे स्पष्ट रूप से साधना के बारे में बताये । रात को करीब पौने चार बजे होगे । बैठे बैठे थकान महसूस हुई इसलिये मैं लेटकर प्रार्थना करने लगा । मन-ही-मन सोचता रहा की सांईबाबा के बारे में जो चमत्कारिक बातें सुनने में आती है, क्या वो सच होगी ? हालाकि उनकी समर्थता का प्रमाण मुझे मिल चुका था, मगर जाग्रत अवस्था में एसा अनुभव मिले तो मैं मानूँ ।
मैंने मनोमन सांईबाबा को कहा, मेरी इच्छा पूरी करना आपके लिये बाँये हाथ का खेल है फिर भी आप चूप हो । क्या यही आपकी भक्तवत्सलता है ? एसे विचार चल रहे थे की कमरे में लगी सांईबाबा की तसवीर से उनका स्वरूप निकलकर मेरे पास आया । उन्होंने श्वते वस्त्र धारण किये थे और दाढी नहीं थी । उनका स्वरूप मेरे तकिये के पास आया । उपर का आधा हिस्सा छोडकर बाकी का स्वरूप धीरेधीरे अदृश्य होता गया । केवल मुख बाकी बचा । मुझे लगा की वो मुझसे कुछ कहेंगे । वो धीरे-से बोलें । उनके शब्द स्पष्ट थे, मानो किसी को डिक्टेशन लिखा रहें हो । उसे सुनकर मुझे बेहद खुशी हुई । ज्यादा खुशी इस बात की थी की मैं जाग्रत था और पूरे होशोहवास में उसे सुन रहा था ।
सांईबाबा ने मधुर स्वर में कहा: 'चिंता करने की आवश्यकता नहीं है । इस साल ज्येष्ठ सुद पांचम को बदरीनाथ धाम में माँ का साक्षात दर्शन होगा । आपकी सभी इच्छा पूरी होगी ।'
अनुभूति खत्म होने पर देखा तो घडी में चार बजे थे । इस अलौकिक अनुभव के लिये मैंने सांईबाबा को धन्यवाद कहा । इससे उनके प्रति मेरे पूज्यभाव में इजाफा हुआ । सांईबाबा को मेरा शत शत प्रणाम है ।

