कहा जाता है की 'जिसको राखे साँईया मार सके ना कोई ?' यानी की जिसकी देखभाल इश्वर करता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड सकता । बदरीनाथ की यात्रा के दौरान एसी ही घटना घटी । बदरीनाथ के मार्ग में विष्णुप्रयाग से आगे बलदौडा-चट्टी आती है । वहाँ से घाट-चट्टी का करीब तीन मील का रास्ता है । रास्ता कठिन है और मार्ग शुरु होते ही एक पुल आता है । हम उस पर चल रहे थे की किसीके चिल्लाने की आवाज सुनी । हमारे आसपास कोई नहीं था, इसलिये हमें आश्चर्य हुआ । मैं और माताजी विस्मित होकर आसपास देखने लगे । देखा तो पुल के सामने छोर से कुछ लोग आवाज दे रहे थे । बात यूँ थी की एक वृद्धा अपने साथीओं से पीछड गयी थी । उसे ठीक तरह से दिखाई नहीं देता था । वो मुख्य मार्ग से भटककर किसी पगदंडी पर जा रही थी, जो उसे पर्वत की टोच पर ले जाती थी । यहाँ से वो सीधी गंगाजी में गिर सकती थी । हमने देखा तो वृद्धा चलते-चलते मार्ग के अंत तक आ पहूँची थी । अब एक कदम आगे बढाने पर वो नीचे गिर सकती थी । हमारी नजर वृद्धा पर पडी और हम परिस्थिति की गंभीरता को समज गये । हम वृद्धा को पकडकर मुख्य मार्ग पर ले आये । एक ही कदम उसके जीवन का अन्त कर सकता था, मगर जिसे राम रक्खे, उसे कौन हानि पहूँचा सकता है ? वृद्धा के साथी-संगी भले उसके साथ नहीं थे, मगर जौ सबके साथ रहता है, वो इश्वर उसके साथ था । इसलिये वृद्धा की रक्षा हुई । जब उसे परिस्थिति की गंभीरता का पता चला तो उसकी आँखो में आँसू आ गये ।
हमने कहा: यात्रा का मार्ग विकट है, यहाँ अकेला चलना ठीक नहीं है । रास्ता भटक जाओगी तो तकलिफ होगी ।
वो रोकर कहने लगी: 'मेरे साथ जो लोग आये है, वो मुझे साथ नहीं रखते और आगे-आगे चले जाते है ।'
बुढिया के साथवाले लोग भी अजीब थे । एक वृद्धा की देखभाल करके उसको यात्रा कराने का पुण्य लेने के बजाय किसी और पुण्य की कामना कर रहे थे ।
हमें वृद्धा को राह दिखाने का मौका मिला इससे हमें बेहद खुशी हुई । हे इश्वर ! तू जिसे बचाना चाहता है, उसे किसी भी रीत से बचा लेता है । अगर हम कभी अपने रास्ते से भटक जायें, तो हमें भी बचा लेना । हमारा हाथ कभी नहीं छोडना । जीवन की इस महायात्रा में हमेशा हमारे साथ रहेना ।
बदरीनाथ से लौटते वक्त जब हम फिर वहाँ से गुजरे तो हमें वो वृद्धा का स्मरण हुआ ।
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बदरीनाथ में एक विरक्त साधुपुरुष के दर्शन का लाभ मिला, जिनका नाम रामदासजी था । वो मंदिर के बाहर लगी दुकानों के पीछे के हिस्से में रहते थे । सर्दीयों की मौसम में भी रामदासजी यहीं रहते है । इससे उनकी नितांत एकांतप्रियता तथा तितिक्षा का प्रमाण मिलता है ।
पिछले पचास सालों में एसे दो-तीन महापुरुष हुए है जो सर्दीयों की मौसम में बदरीनाथ में रहते थे । इनमें से एक थे सिद्धबाबा सुंदरनाथजी तथा दूसरे बच्चीदासजी । हालाकि बच्चीदासजी कभीकभी सर्दीयों में बदरीनाथ छोड देते थे । इन दोनों के अलावा वसुधारा की गुफा में एक महापुरुष रहते थे । तीनों महात्मा पुरुषों ने हिमालय की भूमि में अपना देह त्याग दिया । सुंदरनाथजी के बारे में कहा जाता है की वो अदृश्य हो गये थे । रामदासजी उसे याद करके कहने लगे की मेरा भी वैसा होगा । दो-तीन साल में मैं भी चला जाउँगा ।
रामदासजी शास्त्रों के अभ्यासी या ज्ञानी नहीं है । जो उनके पास मार्गदर्शन की अपेक्षा से जायेगा वो निराश होगा । फिर भी उनमें एक विशेषता जरूर है जो अन्य साधुओं में देखने को नहीं मिलती । यहाँ के ज्यादातर साधु-महात्मा भिक्षा के लिये भागदौड करते है, यात्रीओं से माँगते रहते है मगर रामदासजी एसे नहीं है । चाहे बारीश हो, धूप हो या ठंड, वो एक ही जगह पर बैठे रहते है, और किसीसे कुछ नहीं माँगते । इश्वरेच्छा से जो कुछ मिलता है, उसमें गुजारा कर लेते है । उनकी निस्पृहता प्रशंसनीय है । अगर हम उनसे शांति, सहज स्वीकार तथा निस्पृहता का संदेश ग्रहण करें तो हमारा उनसे मिलना व्यर्थ नहीं होगा । एसे महापुरुष को हमारा नमस्कार है, प्रेमपूर्वक प्रणाम है !
कुछ मिलाकर सत्रह दिन रहने के बाद हम बदरीनाथ से ऋषिकेश के लिये निकले । जिस दिन बदरीनाथ से निकलनेवाले थे, मंदिर में साधुसंतो की मंडली इकट्ठा हुई थी । इसे देखकर हमें आश्चर्य हुआ । पूछने पर पता चला की पार्लामेन्ट के हरिजन सदस्य बदरीनाथ मंदिर की मुलाकात करने आये थे । उनको मंदिर में प्रवेश देना चाहिये या नहीं इसकी चर्चा करने के लिये साधुसमाज इकट्ठा हुआ था । फिर खबर मिली की साधुओं की भावना का सम्मान करते हुए वो केवल गरुडजी के स्थान का दर्शन करके निकल गये थे । लोगों में ये घटना चर्चा का केन्द्र बनी थी ।
बदरीनाथ धाम की हमारी यात्रा एसे कई कारणों से यादगार रही । बदरीनाथ से वापस आकर हम पाँच-छे दिन देवप्रयाग रहें और फिर ऋषिकेश लौट आये ।

