सन १९७० के प्रारंभ में श्री मोरारजी देसाई को मिलने का सुयोग उपस्थित हुआ । तब वो बंबई में अपने पुत्र के घर थे । उन्होंने संदेशा भेजा था की अगर मैं आपको मिलने आउँगा तो खामखाँ लोग इकट्ठा हो जायेंगे इसलिये बहेतर होगा की आप पधारनें का कष्ट करें । हमारा निवास प्रेमकुटिर में था, जो उनके निवासस्थान के बहुत करीब था, इसलिये हम उनको मिलने गये ।
उन्होंने हमारा स्वागत किया । उनके मुखमंडल पर विषाद था । देश की वर्तमान परिस्थिति से वे नाखुश और पीडित थे । उनके साथ हुई बातचीत से ये बात स्पष्ट हुई ।
उन्होंने कहा: ज्यादातर लोग सच नहीं समजते है, फिर हम क्या करें ? वक्त आने पर उनको पता चलेगा । अब तो ईश्वर को प्रार्थना करने के अलावा मुझे कोई विकल्प नहीं सूझता ।
एसा कहकर उन्होंने कमरे में लगी रमण महर्षि की तसवीर की और दृष्टिपात किया । शायद उनको महर्षि जैसे समर्थ संतपुरुषों की शक्ति पर भरोंसा था । मेरी किताब ‘गांधीगौरव’ की बात निकलने पर उन्होंने कहा की वो मुझे और नवजीवन ट्रस्ट को आमुख की कोपी एक सप्ताह के अंदर भेज देंगे ।
जब हम वहाँ से निकले तो वो हमें द्वार तक छोडने आये । वो प्रणाम करके बोलें: आशीर्वाद दो की सब मंगल हो ।
मैंने कहा: आपके उपर इश्वर का आशीर्वाद है ।
एसे लोकहितैषी, सेवाव्रतधारी राजपुरुष पर इश्वर का आशीर्वाद क्यूँ नहीं होगा ? जब तक देश की भलाई के लिये चिंता करनेवाले तथा इसके लिये समर्पण करनेवाले एसे राजपुरुष जिवीत है तब तक हमारा देश सुरक्षित है ।
मोरारजीभाई को देखकर मुझे संत तुलसीदास की ये पंक्ति का स्मरण हुआ:
परहित बस जिनके मनमांही,
तिनको जग दुर्लभ कछु नाहीं ।
जैसे उन्होंने मुझे कहा था, बराबर साँतवे दिन मुझे और नवजीवन ट्रस्ट को उनकी लिखी हुई आमुख की नकल मिल गयी ।

