महापुरुषों के लीलास्थान आम नहीं रहते, खास बन जाते है । वहाँ जाने से हमें नयी प्रेरणा मिलती है । संतशिरोमणी ज्ञानेश्वर महाराज का लीलास्थान आलंदी भी वैसा है । वहाँ जानेका सुयोग मेरे जीवन में कई बार आया है और हर वक्त मुझे वहाँ जाने से नवीन प्रेरणा मिली है ।
सन १९७० में वहाँ एक रात रहना हुआ था । तब मुझे ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन की इच्छा थी । मैं रात में आत्मिक अनुसंधान करके प्रार्थना करता रहा । उस वक्त हम समाधि मंदिर की बगल की धर्मशाला में ठहरे थे । रात को करीब दो बजे मेरा मन असाधारण शांति का अनुभव करने लगा और मुझे ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन हुए । उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी, आहलादक और आकर्षक था । कुछ देर मुझसे वार्तालाप करके वो अदृश्य हो गये ।
आलंदी की यात्रा में हमारे साथ बंबई के कांतिभाई भी थे । पूना में मेरे प्रवचनों की परिसमाप्ति के बाद वो एकांतवास के लिये पूना आये थे । वहाँ से हम नासिक गये । नासिक में वो हररोज मेरे साथ ध्यान में बैठते थे । एक दिन मुझे अपने पूर्वजन्मों का अनुभव करने की आकांक्षा हुई । इसके फलस्वरूप मुझे मेरे चार पूर्वजन्मों का दर्शन हुआ । चारों पूर्वजन्म संतपुरुषों के थे । ध्यान से जाग्रत होने के बाद मैंने कांतिभाई को पूछा की क्या आपको कोई अनुभव हुआ तो उन्होंने कहा की मन एकदम शांत हो गया और मुझे अलग अलग चार महात्मा पुरुषों का दर्शन हुआ । उनमें से एक को मैं पहचान सका, बाकी तीन कौन थे इसका मुझे पता नहीं चला । मैंने उन महापुरुषों का वर्णन करने को कहा । जब कांतिभाई ने चारों महापुरुषों का वर्णन किया तो पता चला की उन्हें भी वो चार महात्मा पुरुषों के दर्शन हुए थे जो मुझे हुए । ये उनके निष्कपट और सरल स्वभाव का फल था ।
*
पीछले कुछ सालों में कांतिभाई हमारी काफि निकट आ चुके थे । उन्होंने मेरे साथ सौराष्ट्र, बदरी-केदार, गंगोत्री तथा पशुपतिनाथ की यात्रा की थी । १९७५ की १५ अगस्त को उनका शरीर शांत हो गया । मृत्यु के पश्चात उनकी सुचनानुसार उनके नेत्रों का दान किया गया । उनके चले जाने से उनके परिवारजनों को भारी खोट पडी ।
जाने के पहले उन्होंने घर के सभी व्यक्तिओं को सूचना दी थी: मेरे मृत्यु पश्चात कोई रोयेगा नहीं, कोई शोक नहीं मनायेगा । जो जन्म लेता है उसका एक-न-एक दिन पृथ्वीपट से जाना निश्चित है । मेरे मरणोपरांत घर में भगवद् गीता और विष्णुसहस्त्रनाम का समूह पाठ करना । संतो और विद्वान पुरुषों को आमंत्रित करके सत्संग करना । मन को परमात्मा में लगाने की कोशिश करना । यही कार्य करने जैसा है ।
जब उनसे पूछा गया की आपकी कोई इच्छा है, आप किसीसे कुछ कहना चाहते है, तो उन्होंने उत्तर दिया था की मुझे कोई ईच्छा नहीं है, किसीसे कुछ कहना नहीं है । सब सदबुद्धि से संपन्न है, अपना मार्ग खुद ढूँढ लेंगे । मुझे किसीकी चिन्ता नहीं है ।
उनके कुटुंबीजन मुझे और माताजी को आग्रह करके मसूरी से हरिद्वार ले गये । हरिद्वार के ब्रह्मकुंड में उनके अस्थिओं को प्रवाहित किया गया । दोपहर में जब हम वापिस लौटे तो वो सूक्ष्मरूप में मेरे सामने उपस्थित हुए । अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहने लगे, आपकी संनिधि में अस्थि विसर्जन हुआ इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।
जो दूसरों की समुन्नति, सुखाकारी और शांति की कामना करते है, उसके लिये प्रयास करते है, वो हमेशा सुख और शांति प्राप्त करते है । कांतिभाई के संदर्भ में यह शब्द सत्य हुए ।
कांतिभाई के स्वर्गवास के पंद्रह दिन बाद डोक्टर रसिकलाल का स्वर्गवास हुआ । वो भी परगजु और सेवाभावी इन्सान थे । उनकी उदात्तता हमेशा याद रहेगी ।

