Wednesday, November 25, 2020

व्यवहार में ज्ञान संभव है या नहीं ?

अर्जुन का हृदय कितना सरल था यह तो हमें उसके उपरोक्त शब्दों से ही ज्ञात हो जाता है । उसे लड़ने की इच्छा नहीं है । स्वजनों के साथ कुछ विद्वान कहते हैं कि गीता का सच्चा आरम्भ यहीं से मानना चाहिए । दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से ही गीता की ज्ञान-गंगा भगवान के हृदय के गोमुख से शुरू होती है । हम कहेंगे कि यह बात तो ठीक है, किन्तु यह गंगा किस कारण प्रवाहित हुई ? गीता के पहले अध्याय तथा दूसरे अध्याय के प्रारंभ की बात को पढ़े बिना उसका स्मरण सबको कैसे आ सकेगा ?

यह सच है कि गोमुख से गंगा शुरू होती है, किन्तु हिमालय के भीतर के भाग में भी उसका अस्तित्व नहीं है, ऐसा कौन कह सकेगा ? मकान की कीमत ज्यादा है, लेकिन नींव की कीमत कम है, ऐसा कौन कह सकेगा ? नींव ही पर तो मकान का आधार है । मूल ही में तो वृक्ष की स्थिरता निहित है । इसलिए ही हम कहते हैं कि गीता के प्रारंभ के श्लोक भी कुछ कम महत्व के नहीं ।

उन श्लोकों से पता चलता है कि गीता किस परिस्थिति में कही गई थी । वे अर्जुन के मन को भी चित्रित करते हैं । उसका मूल्य कम नहीं । गीता एकांत जंगल में नहीं, अपितु युद्ध के कोलाहल के बीच में कही गई है । इसलिए उसका मूल्य और भी बढ़ जाता है और जीवन के कोलाहाल के बीच रहनेवाले मनुष्यों के लिए भी वह उपयोगी एवं प्रेरणादायी है, यह भी साबित होता है । यह वस्तु अति महत्वपूर्ण है ।

कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या संसार के अटपटे व्यवहार के बीच रहकर प्रभुप्राप्ति का प्रयास संभव है ! क्या प्रवृत्ति के भीतर रहकर ज्ञान प्राप्ति शक्य है ? ऐसे मनुष्यों का स्वाभाविक ख्याल ऐसा है कि ज्ञान प्राप्ति तो किसी एकांत नदी के तटप्रदेश में या पर्वत पर ही हो सकती है । इसलिए संसार के व्यवहार का त्याग करना चाहिये । इनके बिना ज्ञान मिल ही नहीं सकता और न शांति तथा ईश्वर की कृपा मिल सकती है, किन्तु गीता का मनन करने से यह समज में आ जायेगा कि यह दृष्टिकोण अधूरा है । यह विचारधारा ठीक नहीं । ज्ञान या ईश्वर की कृपा संसार के व्यवहार से दूर रहकर ही हासिल कर सकते हैं, ऐसा मानना अनुचित है । हाँ, यह हो सकता है कोई व्यक्ति किसी विशेष कारणवश व्यवहार से दूर रहकर एकांत का आश्रय ले और ईश्वर कृपा तथा ज्ञान को पाने का प्रयत्न करे । उसमें उसे सफलता भी मिले, किन्तु सिर्फ इसीसे सबको उसी मार्ग का अनुसरण अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए, यह नहीं कहा जा सकता ।

मनुष्य व्यवहार में रहे या न रहे, यह उसकी इच्छा और अनुकूलता पर अवलम्बित है । उस बारे में जबरदस्ती करना ठीक नहीं । जबरदस्ती सिर्फ़ ईश्वर की कृपा या ज्ञान प्राप्ति की योग्यता के बारे में हो सकती है । मनुष्य व्यवहार में रहे या न रहे, यह गौण वस्तु है । प्रधान बात तो यह है कि उसे अपना आवश्यक सुधार कर लेना चाहिए । उसे अपने मनोनीत मार्ग के लिए आवश्यक अधिकार पा लेना चाहिए । मनुष्य ज्यों-ज्यों पूर्ण बनता जाता है, उसके सब काम होते जाते हैं ।

गीतोपदेश कोई निर्जन स्थान या जंगल में नहीं दिया गया था । वह तो व्यवहार के बीच में, बल्कि युद्ध क्षेत्र में ही दिया गया था । एक और शंखनाद हो रहा था और तलवार तथा धनुषबाण धारण किए हुए योद्धा लड़ने के लिए उतावले हो रहे थे । उसी समय गीता की अमरवाणी बहने लगी । गीता की पतितपावन और पुण्यशाली को भी अधिक पावन करनेवाली गंगा उस वक्त प्रकट हुई है ।

गीता के ज्ञान का आविर्भाव किसी निस्तब्ध जंगल में नहीं, किन्तु कोलाहल में हुआ है । अर्जुन को अब क्या करना चाहिए, यह समज में न आने के कारण उसने भगवान की शरण ली और व्याकुल होकर पुकारा, “हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे उपदेश दीजिए । मुझे मेरे लिए उचित मार्ग दिखाइए ।”

परिणाम स्वरुप भगवान ने ज्ञान की पवित्र गंगा प्रकट की । उसी तरह प्रवृत्ति या व्यवहार के बीच में रहकर भी जो भगवान की शरण ले और भगवान की मदद की प्रार्थना करे, वह भगवान की वाणी सुन सकता है । भगवान की कृपा पा सकता है और ज्ञान की गंगा में स्नान भी कर सकता है । इसलिए मनुष्य व्यवहार के भीतर है या बाहर यह बड़ी बात नहीं है । उसका मन किसमें है - संसार में या भगवान में, लौकिक प्रवृत्ति में या आत्मिक विकास में - यह बात महत्वपूर्ण है ।

अर्जुन के चारों ओर भयानक प्रवृत्ति थी, फिर भी उसने भगवान की ओर निगाह डाली तो उसे ज्ञान मिल गया । अगर अर्जुन अहंकार में चूर होकर बैठा रहता तो ज्ञान-गंगा में स्नान करने का यह पवित्र लाभ क्या उसे मिल सकता था ? मनुष्य को प्रवृत्ति करते-करते भी नम्रता धारण करनी चाहिए । भगवान श्रीकृष्ण को बंसी पर बहुत प्रेम था । बंसी की मधुर तान में जब वह अपने हृदय को बहाते तब मानव, पशु, पक्षी तो क्या जड़ पदार्थ भी गद्गद हो जाते थे ।

गोपियों ने बंसी से पूछा, “तुझमें इतना जादू है, इसका कारण क्या है ?” उत्तर मिला – कारण यही है कि मैं बीच में से पोली हूँ । मनुष्य भी अगर (अभिमान से) खाली हो जाय तो भगवान का प्रिय बन जाए और उसके जीवन में से भी स्वर्गीय संगीत निकलने लगे । उसको भारी बनानेवाला कौन है ? अहंकार । साधारण भाषा में कहें तो ‘मैं और मेरा’ यह अभिमान दूर हो जाए और उसके स्थान पर ‘तू और तेरा’ हो जाय, तो जीवन धन्य हो जाए । अर्जुन के जीवन में यही सन्देश समाविष्ट है ।

मनुष्य की शक्ति का कैसा स्वरुप बन जाना चाहिए, उसका ऊंचा द्रष्टांत श्रीकृष्ण के जीवन से मिलता है । गीता में पूर्ण या मुक्त पुरुष के जो लक्षण बताए गए हैं, वे सब श्रीकृष्ण के जीवन में मूर्तिमंत हैं । उनकी शक्ति को देखिये । उनके अद्भुत मनोबल का ज़रा खयाल तो कीजिए । कहीं थोड़ी-सी गड़बड़ी हो जाती हैं तो मनुष्य उद्विग्न हो जाता है और उसका चित्त पढ़ने-लिखने या विचार करने में नहीं लगता । इसीलिए तो सामान्य मनुष्य एकांत खोजता है, लेकिन भगवानने तो युद्ध की कोलाहल युक्त भूमि में ही खड़े रहकर गीता का उपदेश दिया । उनकी आंतरिक शांति की गहराई कितनी अनंत होगी । इसलिए तो उनको पुरुषोत्तम और योगेश्वर कहा जाता है । ऐसी शांति पाने के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए । ऐसा मनोबल मनुष्य मात्र के लिए आदर्श बनना चाहिए ।

भगवान तो शांति के साकार स्वरुप थे । उनकी शांति का किसी भी प्रकार की परिस्थिति में भंग होना असंभव था । इसलिए तो अर्जुन के विचार को देखकर वे हँस रहे थे, लेकिन सिर्फ हँसने से कुछ काम नहीं चल सकता । अर्जुन ने तो अपनी बात कह दी और भगवान के उपदेश की प्रतीक्षा करता हुआ वह दोनों हाथ जोड़कर बैठ गया । अब भगवान ने सोचा कि अर्जुन के विषाद रोग का कुछ उपचार तो करना चाहिए । यह काम उनके लिए मुश्किल भी न था । संसार के छोटे बड़े अनेक रोगों का जो उपचार करते हैं जो जन्ममरण की स्वाभाविक व्याधि से भी मुक्ति दे सकते हैं, उनके लिए अर्जुन के साधारण विषाद का इलाज करना क्या मुश्किल था ?

अर्जुन के विषाद का उपचार करने की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा, “हे अर्जुन, तेरे वचन तो बहुत ही सुंदर हैं । किसी भी पंडित को शोभा दे, वैसी भाषा और शैली में तूने युद्ध न करने के कारण पेश किये हैं । स्वजनों की मृत्यु के डर से तू काँप उठा है और तुजे शोक उत्पन्न हुआ है, यह देखकर मुझे आश्चर्य होता है क्योंकि जो ज्ञानी या पंडित है वह न तो जन्ममरण के ख्याल से डरता है और न मृत्यु का शोक करता है ।” इन्हीं शब्दों के साथ गीता की ज्ञान-गंगा का जन्म होता है । उस गंगा का स्वरुप आगे चलकर विविध रंगी एवं विराट होता जाता है । उस स्वरुप का अमानुसार मनन किया जा सके, इसलिये उसका अध्यायों में बटवारा किया गया है । हम इस वार्तालाप में उस स्वरुप पर सरसरी निगाह डालने की कोशिश कर रहे हैं ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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