Wednesday, November 25, 2020

शरीर की नश्वरता एवं आत्मा की अमरता

इसके साथ-साथ भगवानने अर्जुन को देह की अनित्यता और आत्मा की अमरता का भी उपदेश दिया है । भगवान कहते हैं – “हे अर्जुन, जरा सोच तो, तू किसका शोक कर रहा है । शरीर तो नाशवान है । जल्दी या देर से उसका नाश निश्चित है । ‘नाम उसका नाश’ यह बात शरीर के संबंध में प्रसिद्ध है । नाम और रूपधारी शरीर जो पंचमहाभूत के मिश्रण से तैयार होता है, स्वभाव से ही विकारी, विनाशी तथा अनित्य है । आज या कल उसको मिटना ही है । उसका नाश किसी तरह भी हो, उसकी मृत्यु होने में कोई भी निमित्त बने, लेकिन उसका नाश निश्चित है । मृत्यु तो शरीर का स्वाभाव है उसका शोक क्या ?

मनुष्य जिनको अपना स्वजन और स्नेही समजता है वे क्या सचमुच उसके स्वजन और स्नेही हैं ? जब तक आँखे खुली हैं तभी तक यह सब संबंध है । यह जीवन ही एकमात्र जीवन नहीं । जीवन तो अनंत हैं । अलग-अलग जीवन में जीवात्मा अलग-अलग संबंध स्थापित करती है । इस तरह वह कितनी बार शादी कर चुकी । उसके कितने ही माँ बाप, भाई बहन हो चुके, लेकिन उनमें से सच्चा स्वजन कौन हैं ?

ममता और मोह के बंधन में जीवात्मा बंधी हुई है । उस बंधन को तोड़ डालने से उसे शीघ्र ही समज में आ जाएगा कि संसार में सिर्फ़ एक ईश्वर के सिवाय उसका कोई नहीं है । उस ईश्वर से ही प्रेम रखना चाहिये । जो मनुष्य का सच्चा संबंधी और सुहृद है तथा जो मनुष्य का सब प्रकार से शुभ करने में समर्थ है, उस ईश्वर को भूलकर मनुष्य संसार के मायावी बन्धनों में बंध जाता है । वह कुछ लोगों को अपना मानता है और दूसरों को पराया । इसे कहते हैं अज्ञान । उस अज्ञान में से मनुष्य को मुक्त होने की आवश्यकता है । तभी उसे शांति मिल सकेगी ।

अगर हम आत्मा के बारे में सोचें तो हमे मालूम होगा कि आत्मा अविनाशी है । अतः उसका शोक करना मूर्खता है । आत्मा हमेशा के लिए अमर है । उसे शस्त्र छेद नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता । मृत्यु का शासन संसार के सभी पदार्थों के ऊपर चलता है, लेकिन आत्मा उससे स्वतंत्र है । मौत की छाया सभी जगह छाई हुई है । लेकिन अविनाशी आत्मा उस छाया से मुक्त है । गीता का यह महत्वपूर्ण संदेश है । उस संदेश को समजनेवाला कभी अपनी या दूसरों की मौत का शोक नहीं करता । कहा जाता है कि मनुष्य मर गया, लेकिन जरा सोचो तो कौन मर गया ? केवल देह ही । देह के भीतर से हंस उड़ गया । उस हंस जैसे आत्मा को न तो जन्म लेना है, न मरना । अतएव मर गया, ऐसा कहने की बजाय मनुष्य का शरीर छूट गया या वह भगवान के धाम को चला गया, ऐसा कहना चाहिए ।

यह आत्मा ही मनुष्य का मूल स्वरुप है, पर अज्ञान के वशीभूत होकर वह इस साढ़े तीन हाथ के पुतले को ही अपना स्वरुप मान बैठा है । शरीर को जरूरत से ज्यादा महत्व देकर उसकी परवरिश में ही वह मशगूल रहता है । शरीर तो गंदगी का घर है । उसके अन्दर आत्मा का आलोक व्याप्त है, इसी कारण वह कामकाज करता है तथा जड़ होने पर भी चेतन प्रतीत होता है, किन्तु उसकी चेतनता तभी तक है जब तक उसमें आत्माकी सत्ता रहती है । आत्मा का प्रकाश दूर होते ही उसकी दुर्दशा हो जाती है । वह निष्क्रिय हो जाता है । समय बीतने पर उसमें दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है और उसका जल्दी से नाश कर देना पड़ता है । इस प्रकार वह मनुष्य का मूल स्वरुप नहीं है, फिर भी संसार में अधिकांश लोग अपने आपको शरीर ही समजते हैं तथा शरीर के ही लालन पालन में निमग्न रहकर उस पर गर्व भी करते हैं ।

यह शरीर अनेक प्रकार की व्याधि एवं मलिनता से परिपूर्ण है तथा बाल्यावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था से ग्रस्त है । इसे प्रतिदिन साफ़ किया जाय तथा उत्तम से उत्तम जल तथा इत्र से सुवासित किया जाय, फिर भी क्या ? ईश्वर ने उसकी रचना ही इस प्रकार की है कि उसमें से दुर्गन्ध ही निकलती रहे, उसमें कचरा जमा होता रहे तथा उसके रोम रोम में से बुरे तत्व टपकते ही रहे । ऐसे शरीर में ममता रखकर मनुष्य बद्ध होता है, यह सबसे बड़ा आश्चर्य है ।

हमारा कहने का तात्पर्य यह नहीं कि शरीर की देखभाल न की जाय और वह गंदगी का घर है, इसलिए उसे स्वच्छ या सुशोभित न रखा जाय । आंतरिक गंदगी को दूर करने का सामर्थ्य मनुष्य में नहीं है, किन्तु यथासंभव उस गंदगी को बाहर निकालते रहना चाहिए । शरीर को निर्मल रखना बहुत आवश्यक है, किन्तु शरीर की अतिशय ममता एवं आसक्ति से छुटकारा निश्चय रूप से प्राप्त करना चाहिए ।

हमारा देश तो संस्कृति का अद्भूत संगमस्थान है । यहाँ की प्रजा धर्मपरायण है । धर्म एवं ईश्वर पर गौरव लेनेवाले लोग अन्य सब देशों की अपेक्षा यहाँ अधिक रहते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं । शरीर की क्षुद्रता तथा आत्मा की अमरता के गौरवगीत इस देश में कम नहीं गाए जाते । धर्म का मूल्य शरीर की अपेक्षा कई गुना अधिक है, यह समजकर धर्म के नाम पर शरीर का बलिदान देने के लिए तत्पर हो जानेवाले हज़ारों नरनारी इस देश में बसते हैं । अतः इस देश की महान प्रजा को शरीर की साधारणता एवं आत्मा की अमरता का संदेश नये सिरे से देने की आवश्यकता नहीं, किन्तु इस संदेश को समजने की एवं उसका आचरण जीवन में करने की आवश्यकता इस देश की प्रजा को तथा अन्य देशों की प्रजा को भी है । अतः इस संदेश को याद करने की जरूरत है ।

इस देश की प्रजा अब भी आकर्षण, मोह एवं विलास से छुटकारा नहीं पा सकी है, यह बात कटु एवं दुःखपूर्ण होने पर भी दीये की भाँति स्पष्ट है । प्रत्येक वर्ष शरीरको सजाने की कितनी ही सामग्री इस देश में इस्तेमाल होती है । विदेश से ऐसे सामान की कितनी बड़ी आयात होती है और इसके लिए कितना धन व्यय करना पड़ता है ? पाउडर, क्रीम, रूज़, नाखून रंगने के साधन इत्यादि इस प्रजा में अधिक से अधिक प्रचलित होते जा रहे हैं । वृद्ध स्त्री पुरुष भी इनका उपयोग करके अपने शरीर को अधिक से अधिक आकर्षक बनाने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु क्या इससे शरीर की सुन्दरता एवं आकर्षण शक्ति बढती है ? शरीर की सुन्दरता का पाउडर, क्रीम इत्यादि बाह्य चीजों से क्या संबंध ? यह तो नकली रूप है ।

क्या नकली सौन्दर्य असली सौन्दर्य की बराबरी कर सकता है ? बिना पत्तों के, सूखे, सड़े हुए वृक्ष पर रंगबिरंगी चादर ढकने से वृक्ष को क्या अपनी मूल सुन्दरता मिल जायगी ? ठीक उपाय तो यह है कि इसे पानी पिलाओ तथा उसके मूल में प्राण दान करनेवाली खाद डाल दो । इसी तरह शरीर को सुंदर बनाने के लिए शक्ति, स्वस्थता एवं आरोग्य हासिल करो । ऐसा करने से शरीर के भीतर ही से सौंदर्य एवं आकर्षण प्रकट होगा, लेकिन लोग तो शरीर के मोह में फंसे हुए हैं ।

देश के नेताओं को बढ़ती हुई जनसंख्या का प्रश्न परेशान कर रहा है । इसके विपरीत कुछ ऐसे भी देश है जहाँ प्रजोत्पति को परिपोषित व प्रोत्साहित किया जाता है तथा उसके लिए इनाम भी दिए जाते हैं। शरीर के मोह एवं विलास को बढाने वाली यह पद्धति सभ्य मानवजाति के लिए सचमुच लज्जास्पद है । शरीर के मोह एवं विलास से छूटने की शिक्षा यदि मनुष्य को मिल जाय तो जनसंख्या की वृद्धि का प्रश्न आसानी से हल हो सकता है । इस देश के लोगों के लिए इस शिक्षा का यथोचित चरितार्थ करने का कार्य क्या मुश्किल है ? तनिक भी नहीं । उसके लिए मनुष्य को तैयार होना पड़ेगा ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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