Fri, Nov 27, 2020

तृतीय अध्याय का आरंभ एवं उसका कारण

बीज के अंदर वृक्ष निवास करता है, यह आश्चर्य की वात है पर एक सत्य है जैसा की सब जानते है । बीज में से ही विशालकाय वृक्ष निकलता है और फूलता फलता है । बीज में वृक्ष छिपा रहता है । मनुष्य अनाज खाता है । अनेक क्रमों से गुजरने के बाद वही अनाज हड्डी, मांस और खून में बदल जाता है और उसीसे मानव शरीर बन जाता है । इसी प्रकार गीता की भी असाधारण सृष्टि हुई । स्वजनों को देखकर अर्जुन को शोक पैदा हुआ, जैसा कि पहले अध्यायमें बताया जा चुका है । संसारमें ऐसे या इससे मिलते जुलते शोक के प्रसंग प्रायः¬ हुआ ही करते हैं । अर्जुन के संस्कार भिन्न थे, यह उसके भाग्य में था । ऐसा कहा जाता है कि प्रभु की कृपा के बिना संतपुरुषों से मिलाप नहीं होता । ऐसे मिलाप जब हो जाते हैं तो उलझनें मिट जाती है तथा मन को शांति मिलती है । समझदार आदमी प्रभु के द्वार पर प्रार्थना करता रहता है कि हे प्रभु, तू असत्य की ओर से मुझे सत्य की ओर ले जा, गहरे अंधकार से परम प्रकाश की ओर ले जा, मृत्यु से अमृत की ओर ले जा । मैं तेरा हूँ, मुज़े अपने दर्शन का दान देकर कृतार्थ कर । सत्य अमरता और प्रकाश के मार्ग का पथिक बनने का प्रयास वह करता है, किन्तु यह प्रयास आसान नहीं । इसीलिए पथप्रदर्शन के लिए वह संतजनो का साथ ढूंढता है । अकेला मनुष्य तैरने की कला नहीं सीख सकता । शुरू में तो उसे ऐसे आदमी की सहायता लेनी ही पडेगी जो तैरने में कुशल हो । इसी तरह संसार को तैरने की कला शीखने के लिए महापुरुषों की आवश्यकता है । महापुरुषों का समागम होने पर और उनके दर्शन मिलने पर यह काम आसान हो जाता है । ऐसे दर्शन बिना भाग्य के प्राप्त नहीं होते ऐसा कहा जाता है । अर्जुन भाग्यशाली था । उसके पूर्व पुण्यों का एकाएक उदय होने के कारण उसे स्वयं भगवान कृष्ण सारथी तथा मार्गदर्शक के रूप में मिल गये । उनकी छत्रछाया में वह सदा के लिए अमर हो गया । अर्जुन को जो विषाद हुआ वह था तो मामूली, किन्तु विशेष परिस्थितियों से वह असाधारण बन गया । उस विषाद से ही गीताज्ञान का जन्म हुआ जिसने केवल अर्जुन ही के मोह को दूर नहीं किया बल्कि जो समस्त मानवजाति के लिए संसार सागर में प्रकाशस्तंभ का काम सहस्त्रों वर्ष से करता चला आ रहा है । इस प्रकार साधारण विषाद भी योगमय हो गया, साधना का ही स्वरूप हो गया । इसलिए ही गीताकार ने प्रथम अध्याय का नाम रखा है, “अर्जुन विषादयोग“ ।

जिस समय अर्जुनने कुरुक्षेत्र के मैदान में जाने की तैयारी की थी, उस वक्त उसे अपने ऐसे उत्तम भाग्य की क्या खबर थी ? जब उसे विषादने आ घेरा, तब भी उसे क्या पता था कि वह विषाद उसके तथा दूसरों के लिए ऐतिहासिक बन जायेगा । अर्जुन के विषादरूपी बीजमें से गीतोपदेश का इतना बडा विशाल वृक्ष उत्पन्न होगा इसकी कल्पना भी किसको हो सकती है? किन्तु आज तो वह बिलकुल सत्य घटना हो गई है तथा जगत को उपयोगी जीवनदान देनेवाली साबित हो गई है । संसार के ताप से तप्त तथा श्रमित प्रवासी इस वृक्ष की छाया में बैठकर आनंद का अनुभव करते हैं और स्वर्गीय सुख प्राप्त करते हैं । परमार्थ प्रदेश के अनेक पंछी उसकी शाखों में घोंसला बनाते है, विश्राम लेते हैं और शांति प्राप्त करते हैं । वह सबके लिए मंगलमय एवं आशीर्वाद स्वरूप हुआ है।

दूसरे अध्यायमें भगवानने स्वधर्म पालन की शिक्षा दी और साथ ही साथ वह भी बताया कि विवेकबुद्धि से कर्म करना चाहिए । इतना कहकर वे रूक गये होते तो कोई हर्ज नहीं था, किन्तु वे तो आहलादपूर्ण होकर दो कदम आगे बढ़ गये । ऐसा प्राय: देखा जाता है कि गाने के शौक़ीन को जब एक-दो गीत गाने को कहा जाता है तो वह अनेक गीत गाने लगता है और उसको रोकना मुशकिल हो जाता है । महुआ में ऐसा ही हुआ था ।

कीर्तनकारों की एक मंडली ने मुझसे कीर्तन और भजन सुनाने की इजाजत माँगी । मैंने उत्तर दिया कि आधे घण्टे में जो सुनाना हो सुना देना । उन्होंने कहा कि आधा घण्टा तो तैयारी करने और गाने के मूल रंगमें आने में ही लग जायेगा । मैंने उत्तर दिया कि कोई हर्ज नहीं, तैयारी करके ही आना और मूड में आकर गाना शुरु करना । गाँव में सामान्यतया ऐसा होता है कि रात का भोजन करने के बाद सब लोग इकट्ठे होते हैं और प्रारंभ में कुछ देर तक तबले और तंबूरे के तार सँवारते है और बाद में रात की नीरव बेला में मंजीरे तथा करताल की सहायता से भजन गाते हैं । फिर तो एक के बाद एक भजन चलता ही रहता है । इस प्रकार कभी कभी सारी रात बीत जाती है और भजन भी एक से एक बढिया ! सब पर एक नशा सा छा जाता है और मन एकाग्र रहता है । इस दृष्टि से देखा जाए तो मैंने जो आधे घण्टे का समय दिया था वह कम था । किन्तु कीर्तनकार तो कृतनिश्चयी थे । वक्त पर आ गए और भजन कीर्तन शुरु कर दिया । तंबूरे, तबले तथा अन्य वाद्यों को सँवारने में बहुत समय चला गया और फिर जो भजन शुरु हुआ तो कोई पौन घण्टे के बाद पूरा हुआ । फिर तो रंग जमा । भजनों का सिलसिला चलने लगा और मुझे लगा की गवैयों की गाने की भूख बढती ही जा रही है । अतएव इसका कुछ रास्ता निकालना चाहिए । भजनमंडली के मुखिया से मैंने कहा कि ये अंतिम भजन है, तभी गाने की समाप्ति हुई । भजनो में तो ऐसा होता ही है, यह उनका कहना था ।

गीतोपदेश भी भजन गाने के समान आगे को बढ़ता ही जाता है । कभी कभी हमें ऐसा जान पड़ता है कि उपदेश अभी पुरा हो जायगा, किन्तु अध्याय का अंत होते होते कुछ ऐसी बात उपस्थित हो जाती है जिसके लिए एक नया अध्याय शुरु करना ही पडता है । भगवान ने यदि विवेकबुद्धि से कर्म करने का उपदेश देकर गाडी को रोक दिया होता तो बात इतनी आगे नहीं बढती । लेकिन उन्होंने तो दो स्टेशन और आगे गाडी बढ़ा दी । उन्होंने शिक्षा दी कि लौकिक व पारलौकिक भोगवासना का त्याग करना चाहिए तथा परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करना चाहिए । बिना ज्ञान के यह संभव नही है, अतः उसकी तथा उसकी प्राप्ति से पूर्ण महापुरुषों की महिमा का गान किया, जिससे अर्जुन की जिज्ञासा बढ़ी । उसका दर्शन हमें तीसरे अध्याय के प्रारंभ में हो जाता है । भजन मंडलीमें जब भजन के रसिये इकट्ठे होते हैं तो नये नये भजन शुरु हो जाते हैं । यदि गानेवाले रसिक हों और सुननेवाले अरसिक हों तो मज़ा किरकिरा हो जाता है और वात वहीं रुक जाती है परन्तु यहाँ तो एक नहीं दो-दो रसिये जमा हुए थे इसलिए गीता का संगीत आगे बढ़ता जाए इसमें क्या आश्चर्य ?

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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