Wednesday, November 25, 2020

महापुरुषों को कार्य की आवश्यकता नहीं

क्या कभी ऐसी अवस्था आती है जब कार्य पूरा हो जाता है? गीता का कथन है कि मानवजीवन पूर्णता की प्राप्ति के लिए है । मानव एक यात्री है । कई जन्मों से वह जीवन की यात्रा पर निकला है । सफ़र करता हुआ और अच्छे बुरे कर्मों का ऋण चुकाता हुआ अपने मूल स्वरूप परमात्मा के पास पहुँच जाय तभी उसका प्रवास पूरा होता है । जिस उद्देश्य के लिए जीवन प्रारंभ हुआ है, वह तभी सिद्ध हुआ समझा जा सकता है । फिर उसे कोई काम करने की आवश्यकता नहीं रहती । मनुष्य जन्म लेता है और अनेक काम करता है । वह सब कर्म करनेलायक होते हैं ऐसी बात नहीं है । करने योग्य काम तो एक ही है और वह है कि मनुष्य अपने स्वरूप को पहचान ले । जन्म मरण तथा सुख दुःख के घेरे में घूमता हुआ जिससे दुर हो गया है और जिसे भुल गया है उस संसार के स्वामी परमात्मा को पहचान ले । साथ ही साथ, जितना हो सके उतना दुसरों का हित भी कर ले । दूसरे सब काम तो गौण है ।

गीता कहती है कि ईश्वर को पहचानकर जीवन को परिपूर्ण करने के इस कार्य के लिए ही जीवन मिला है । इस संसार के मोह एवं आकर्षण से मुग्ध होकर मनुष्य उस कर्तव्य को भूल गया है । फलतः उसके जीवन में क्लेश, शोक, चिन्ता तथा अशांति भरी रहती है । अपना घर छोड़कर कोई आदमी कुछ दिनों के लिए प्रवास को निकला । पर अपने घर वापिस लौटने की बजाय मार्ग ही में कहीं घर बनाकर रहने लगा । ठीक वैसी दशा मोह में डूबे हुए आदमीयों की है । वे अपने असली घर को भूल गयें है और नक़ली घर से प्रीति कर बेठे हैं । गीता कहती है कि अपने असली वतन में वापिस आए बिना किसीको शांति नहीं मिल सकती । कोई भी मनुष्य ईश्वर से दूर रहकर सुख, शांति और कुशलता नहीं प्राप्त कर सकता । मनुष्य का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि उसे इस किराये के मकान में तथा मायावी पदार्थो में लगाव होता है । लोगों से पूछते हैं कि कैसे हो तो उत्तर देते है मज़े में । लेकिन यह आनंद क्या सच्चा आनंद है? वह कितने दिन तक टिक सकता है? पेड़ के पत्तों पर गिरा हुआ ओसकण थोड़ी ही देर में ओझल हो जाता है, इसी प्रकार वह आनंद भी कुछ ही क्षणो में नष्ट हो जाता है । आज अपने को आनंदित मानने वाला इन्सान भी कर्म एवं परिस्थितियों के चक्कर में आकर फिर रोता है और भयभीत होता है । वह अशांत रहता है क्योंकि वह अपने असली वतन से दूर है, परमात्मा से दूर है, और जो परमात्मा से दूर रहना चाहता है वह मानों दुःख, संताप और चिन्ता को निमंत्रण देता है, अथवा अपने लिए अपने हाथों से ही भय और क्लेश का दस्तावेज तैयार करता है इसमें संदेह नहीं । परमात्मा से दूर रहने पर यदि मनुष्य को हर्ष होता हो तो उसे समझना चाहिए कि वह अभी बदनसीब है । जब उसके भाग जागने का समय निकट आयगा तब संसार में उसे मज़ा नहीं आएगा और वह चिंता में डूब जायगा । परमात्मा को प्राप्त करने के लिए वह बेक़रार हो जाएगा । अपने स्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए वह तड़प उठेगा । कमर कसकर पुरुषार्थ करने में वह जुट जायगा । फलतः वह परमात्मा की प्राप्ति कर लेगा और चिंता तथा दुःख से छुटकारा पा जाएगा । उसकी अशांति दूर होगी और वह स्थायी कुशलता प्राप्त कर लेगा । कर्म के पाश एवं कुदरत के हाथों से वह मुक्ति पा लेगा । जन्म मरण तथा सुख दुःख जैसे द्वंद्वों से मुक्त होकर उसका जीवन परमानंदमय तथा परम शांतिमय हो जाएगा ।

आप में से कोई पूछेगा कि ऐसे महामानव की दशा का तो वर्णन कीजिए । उसके जवाब में सिर्फ इतना ही कहेंगे कि पूरा पूरा वर्णन अभी नहीं करेंगे । अभी तो इतना ही कहेंगे कि ऐसा महापुरुष परमशांति की मूर्ति के समान है । वह खुद अपने में ही तृप्त रहता है । परमात्मा में ही उसकी प्रीति होती है । परमात्मा में ही उसे मज़ा आता है और बिना परमात्मा के उसे कुछ नहीं दिखता । जड़ एवं चेतन सभी में उसे परमात्मा के दर्शन होते हैं । ऐसे महापुरुष की आंतरिक अवस्था का वर्णन कैसे किया जा सकता है? गुंगे आदमी को संसार दिखता है किन्तु उसके रस को किस प्रकार बता सकता है? शब्दों के द्वारा उसकी कुछ झलक दी जा सकती है । मुख्य बात तो अनुभव की है । जो उसका अनुभव करता है वही उसे समझ सकता है । किन्तु एक बात बिना खटके कह सकते हैं कि ऐसे महापुरुष के जीवन में करने योग्य प्रधान कार्य हो चुका होता है । उसके अरमान पूरे हो गए । उसकी इच्छा भी शांत हो गई । उसके जीवन विकास के लिए अब कोई काम बाकी नहीं रहा । उसकी साधना भी पूरी हो गई । अब वह पूर्णता को प्राप्त करके कृतकृत्य हो चुका । इसी अर्थ में गीता माता ने कहा है कि ऐसे मनुष्य के लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता । उसके निजी स्वार्थो का अंत हो गया । अपने जीवन के व्यक्तिगत विकास करने योग्य आत्मिक साधना का कर्म उन्होंने कर लिया ।

इस दशा को प्राप्त करके क्या वह किसी के काम नहीं आएगा? उसका अपना जीवन तो परिपूर्ण हो गया, पर क्या वह दूसकों का सहायक नहीं बनेगा? जरूर बनेगा । ऐसा महापुरुष संसार में दूसरों के लिए प्रेरणाप्रद हो जायगा । उसका दर्शन और संग मानवजाति को जीवनविकास की प्रेरणा देगा । ईश्वर के मार्ग में चलनेवाले साधको को संदेश देगा । निराशा, दुःख और अश्रद्धा की चट्टानों से टकराकर टूट जाने का जिन्हें खतरा है ऐसी कितनी जीवन-नौकाओं के लिए वह प्रकाश स्तंभ के समान हो जायगा और कितनों की सहायता करेगा । संसार में हम देखते हैं तो हर वस्तु के द्वारा दो प्रकार के हेतु सिद्ध होते हैं । सूर्य का प्रकाश उसकी शोभा में वृद्धि करता है और साथ ही सहज रीति से दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनता है । फूल जिस डाली पर खिलता है उसकी शोभा तो बढ़ाता ही है, साथ ही इर्द गिर्द के वातावरण में सुगंध भी फैलाता है । नदी अपने आनंद में मग्न होकर सागर की ओर को प्रवाहित होती है, साथ ही उससे लोक कल्याण का हेतु भी सिद्ध होता है । इसी प्रकार भक्त अथवा महापुरुष का जीवन संसार के लिए सहायक सिद्ध होता है । उसका जीवन संसार के लिए व्यर्थ नहीं होता । उससे संसार के सभी प्राणी लाभ उठा सकते हैं । ऐसे महापुरुष संसार के लिए मंगलमय हो जाते हैं । ईश्वर को भूलकर जड़ता के उपासक बन जानेवाले मानव को ऐसे महापुरुष नीति और आध्यात्मिकता की राह दिखाते हैं । मनुष्य के अंधकारमय जीवन को प्रकाशित करने में सहायक होते हैं । कुछ लोग एतराज़ करेंगे कि मनुष्य खुद शांति प्राप्त करके बैठा रहे तो उससे दूसरों को क्या लाभ? खुद पूर्ण होकर बेठे रहना तो स्वार्थ कहा जाएगा । सिर्फ़ अपनी तरक्की के लिए साधना करना क्या स्वार्थ नहीं है । हम उत्तर देंगे कि जीवन की पूर्णता के लिए साधना करने में यदि स्वार्थ है, तो उससे डरने का कोई कारण नहीं । वह तो एक वांछनीय स्वार्थ है और उसकी सिद्धि में लग जाना प्रत्येक का धर्म है । व्यक्ति समाज ही का एक अंग है । उसके समान अनेक लोग मिलने से समाज बनता है । अतः वह जो कुछ करेगा उसका असर सारे समाज में होगा ।

मान लीजिए कि आप एक गाँव में रहते हैं और उस सारे गाँव को साफ़ करने की शक्ति आप में नहीं है, अथवा किसी भी कारण से आप सारे गाँव को साफ़ नहीं कर सकते । फिर भी अपने ही घर की सफाई कर लेने से क्या आप गाँव की सफाई में सहायक नहीं होते? सूर्य सबको प्रकाश देता है लेकिन जब वह अस्त होता है तो घर में दिये जलाए जाते हैं । उनका प्रकाश सारे विश्व में नहीं पहुंचता । तो क्या इसलिए उन्हें निकम्मा समझकर फेंक देते हैं? सारे गाँव में उनका प्रकाश नहीं पहुंचता किन्तु एक घर का काम तो वे चला ही देते हैं । इसी प्रकार जो मनुष्य अपने विकास के लिए साधना करता है वह अपने साथ ही समाज की कुछ-न-कुछ सेवा तो करता ही है । उसके पावन आलोक से कुछ लोगों का अंधेरा दूर होता है । जो खुद शांति हांसिल कर लेता है वह थोड़ा बहुत दूसरें लोगो के लिए भी शांतिदाता साबित होता है । भारतीय संस्कृति के इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि पूर्णता प्राप्त पुरुष या पूर्णता के लिए प्रयास करनेवाले पुरुष संस्कृति के संरक्षक बने हैं । धर्म और आध्यात्मिक विकास के मूल्यों को उन्हों ने सदा जिन्दा रखा है । और जड़वाद के ज़माने में भी मानवता के मापदंड की रक्षा करने में उनकी सहायता कम नहीं रही है । समाज से दो रोटी और एक लंगोटी की ही अपेक्षा रखकर उन्हों ने बहुत कीमती काम किया है । ऐसे महापुरुष निस्वार्थ सेवा के प्रतिक है, पृथ्वी तथा मानवता की पूंजी है । वे मुक्त और पूर्ण हो गये है । उनके लिए उनके व्यक्तिगत विकास की दृष्टि से करने को अब कुछ भी शेष नहीं रहा है, फिर भी संसार की सहायता वे करते रहते हैं । जीवन के असली ध्येय की सिद्धि उन्होंने कर ली है, फिर भी दूसरों की सहायता करने के लिए वे सदा तैयार रहते हैं । जीवन की समस्याओं का सही सुलझाव करके उन्होंने शांति प्राप्त की है । दूसरे लोग भी शांति प्राप्त कर सकें ऐसा वे चाहते हैं । उनके अंतर में अपार अनुकंपा रहती है । उस अनुकंपा से प्रेरित होकर वे कभी कभी धर्म का प्रसार करने में तत्पर हो जाते है । ऐसे पूर्ण व मुक्त पुरुषों ने संसार में ज़बरदस्त हलचल पैदा की है । ईसा मसीह, बुद्ध, जरथुस्त, कृष्ण, शंकर, नानक और महावीर ऐसे ही मुक्त महापुरुष थे । सब लोग ऐसा विराट कार्य संपादन नहीं कर सकते, किन्तु दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखते हैं, इसलिए अपनी शक्ति, रुचि और सुविधा के अनुसार बड़े या छोटे पैमाने पर लोग सेवा का कार्य करते है । सेवा कार्य करने की बात मानव की रुचि पर अवलंबित है । किन्तु किसी भी परिस्थिति में कर्म या सेवा का परित्याग नहीं करना चाहिए ।

कुछ लोग बाह्य रीति से कुछ भी करना नहीं चाहते । उनकी मान्यता है कि संसार की व्यवस्था का भार ईश्वर खुद वहन करता है, इस लिए हमे उसकी चिंता करने कि आवश्यकता नहीं । हमारी चिंता से क्या होगा । मनुष्य अपने कर्मो का फल प्राप्त करते हैं, ऐसा मानकर वे शांत होकर बैठ जाते है । फिर भी यदि कोई उनके पास जाता है और मदद मांगता है तो वे देते हैं । दूसरे प्रकार के लोग पूर्ण या मुक्त होने के बावजूद भी अधिक से अधिक कार्य करने में मानते हैं । अंधेरे में भटकते हुए और प्रकाश की इच्छा रखनेवाले मनुष्यों को आलोक दिखाते हैं । गुमराह होकर भटकनेवालों को मार्ग दिखाते हैं । वह उचित भी है क्योंकि ईश्वर कृपा प्राप्त सभी आदमी यदि मूक बनकर बैठे रहें तो जिनको ईश्वर की कृपा प्राप्ति करनी है उन्हें कौन राह दिखाएगा? शांति और मुक्ति प्राप्त महापुरुष यदि किसी की सहायता ना करे तो संसार में शाति और मुक्ति चाहनेवाले को मार्गदर्शन कहां से मिलेगा? संसार में कर्म की व्यवस्था भी कैसे रहेगी? अतः ईश्वर ही उनके दिलो में अनुकंपा पेदा करता है । जिससे प्रेरित होकर ही वे परहित के धर्म कार्य में संलग्न हो जाते है । ऐसे महापुरुष कार्य करने को प्रेरित होते हैं और इसके फलस्वरूप संसार को उनकी सेवा का लाभ मिलता है । यह संसार का सौभाग्य है । ऐसे महापुरुषों के कर्म से जगत का सचमुच मंगल होता है ।

सेवा कार्य में अधिक दिलचस्पी न लेने वाले संत और मुक्त मानवों की अपेक्षा सेवा के क्षेत्र में रस लेनेवाले और पडने वाले संत और मुक्त मानव अधिक अभिनंदनीय, आदरपात्र और अनुकरणीय है, इसमें संदेह नहीं । उनके द्वारा समाज अथवा संसार का विशेष हित होता है । इस लिए आत्मतृप्त, पूर्ण या मुक्त पुरुषों को भी अपनी रुचि के अनुसार लोकहित के काम जब तक जीवन रहे तब तक करते रहना चाहिए । श्रेष्ठ पुरुष जो कुछ करते है अन्य लोग भी उसका अनुसरण करते है । इसलिए यदि महापुरुष विलकुल निठल्ले बेठे दिखाई दें तो दूसरे लोग जो महापुरुषों के मन की ऊँची स्थिति को समझ ही नहीं सकते, वे भी उनकी नकल करके अकर्मण्य बनना पसंद करेंगे । इस बात पर ज़ोर देने के लिए भगवान अपना उदाहरण देते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि, ‘यद्यपि मुजे तीनों लोको में कुछ भी करना या पाना बाकी नहीं है, फिर भी मैं काम करता रहता हूँ । क्योंकि यदि मैं सदा काम में लगा न रहूँ तो बड़ी हानि हो जाय । क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं । इसलिए यदि मैं कर्म न करुं तो समस्त मनुष्य और प्रजा नष्ट भ्रष्ट हो जाय ।‘

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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