Wednesday, November 25, 2020

स्वधर्म का पालन कल्याणकारी है

दुःख, क्लेश, दैन्य या किसी भी कारण से अपना कर्तव्य छोड़ने का विचार करने की ज़रूरत नहीं । दुःख तो कया मौत का भी सामना करना हो तो भी फ़र्ज़ को छोड़ने का विचार नहीं करना चाहिए, यह गीता का संदेश है । भारत में कई नारियां अनीतिगृह चलाती है और पुरुष भी उनका साथ देते हैं । अन्य संस्कृत कहे जानेवाले देशों में भी यह रिवाज़ एक या दूसरें रूप में चलता है । कभी कभी तो ऐसा दिख पड़ता है कि मातपिता अपनी पुत्री को और पति अपनी पत्नी को अनीति का कार्य करने के लिए बाध्य करते हैं । और फिर उसकी कमाई से रंगरेलियां मनाते हैं । भारत के किसी भी बड़े शहर में जाइए तो अनीति के काम द्वारा कमाई करनेवाली स्त्रियां सैंकडों की तादाद में आपको दिखाई दे सकती हैं । होटलों में भी यही हालत है । अनेक दिशाओमें सुधार होते हैं, भिन्न भिन्न नये कानून बनाये जाते हैं, किन्तु मानवजाति के एक बड़े वर्ग को इस जिन्दा नर्क से निकालने की कोई योजना नहीं तैयार होती । स्त्री पुरुष के समान अधिकार की आवाज़ उठानेवाली संस्थाए भी इसके लिए कोई प्रयत्न नहीं करती । मानवजाति के लिए किसी भी स्थल और संजोग में लज्जास्पद इस प्रथा को दूर करने की जरूरत है । सुसंस्कृत मानवजाति के लिए वह कलंक है । इस प्रथा के बारे में अधिक चर्चा करने का यह स्थल नहीं है । कुछ लोग तर्क करते हैं कि गरीब अनाथ स्त्रीयां गुज़ारे के लिए दूसरा करे भी क्या? उनकी दलील त्रुटिग्रस्त है । स्त्री चाहे गरीब या अनाथ हो फिर भी उसे अपना शील बेचने का ख़याल नहीं करना चाहिए । वह दूसरा कोई भी काम कर सकती है । जीविकोपार्जन के अन्य बहोत से क्षेत्र हैं । इसके बदले अनीति करने को तैयार हो जाना ठीक नहीं । जो स्त्री अपने शरीर की पवित्रता को महत्वपूर्ण समझती है, वह भूखीं मर जायगी, दुःखी होकर, निर्धन होकर रहेगी और अंत में मरना बेहतर समझेगी लेकिन शील बेचना कदापि पसंद नहीं करेगी । कया चित्तोड की राजपूत रमणीयों ने पवित्रता की रक्षा के लिए परपुरुष के हाथ में जाने की अपेक्षा अग्नि में कूदकर भस्म हो जाना पसंद नहीं किया था? रावण की राक्षसी नगरी में रहकर, अनेकों कष्ट सहकर भी क्या सीताजीने अपने सतीत्व की रक्षा नहीं की थी? अपनी पवित्रता को भंग करने की अपेक्षा मनुष्य मोत को पसंद करे, यहि अच्छा है । पवित्रता की रक्षा स्त्री का स्वधर्म है । उसका पालन प्रत्येक परिस्थितिमें उसे करना ही चाहिए । मनुष्य को भी जंगली बनना छोड़कर स्त्री की स्वधर्म रक्षा में सहायक बनना चाहिए ।

ज्यादातर लोग निर्बल होते है । अतः दुःख एवं ग़रीबी से चलित हो जाते हैं । ग्रीष्म में बद्रीनाथ की यात्रा होती है । तब कई लोग हिमालय की यात्रा करने जाते है । हरद्वार एवं ऋषिकेश में अन्नक्षेत्र की व्यवस्था है । साधुओं को वहां तैयार रसोई मिलती है । कुछ आदमियों को ऐसा लगता है कि यह व्यवस्था अच्छी है । तैयार खाना मिल जाय फिर क्या चिंता है? घरबार छोड़कर ऐसे स्थानो में रहने का वे विचार करते हैं । कुछ बुद्धिमान पुरुष भी होते है । वे समजते हैं कि तैयार खाने की व्यवस्था कितनी भी अच्छी हो किन्तु हम उसका सहारा नहीं ले सकते । हमें तो मेहनत करके खाना चाहिए और कर्तव्य का पालन करना चाहिए । जिन लोगों के माता पिता स्त्री एवं संतान है उनको उनकी देखभाल करनी चाहिए और अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए । दुःख, क्लेश या सहूलियत का विचार करके अपना कर्तव्य छोडकर प्रमादी या साधु बनने का स्वप्न देखना अच्छा नहीं । कुछ लोग परिवार को छोड़ देते हैं और योगी या भक्त बनकर इधर उधर घूमते रहते हैं । यह एक महान अपराध है । जो तुम्हारे अपने हैं और जिनकी जिम्मेदारी तुम्हारे सिर पर है, उनको निःसहाय और दुःखी छोड़ देने से तुम्हारा कल्याण नहीं होगा, ऐसा निश्चित समज़ लेना । इससे तुम ईश्वर के दरबार में गुनहगार बनोगे । इसलिए अपने फ़र्ज़ को समझो और बिना उकताए हुए उसका पालन करो । मेरे पास सलाह लेने कुछ लोग आते हैं, उनसे मुझे ऐसा ही कहना पड़ता है । अच्छे लोग इसी पद्धति को पसंद करते हैं ।

प्रसिद्ध संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज के पिताजी विठ्ठल पंत के जीवन में ऐसा ही प्रसंग हुआ था । किसी कारण से घरबार छोड़कर वे काशी गये । वहां प्रसिद्ध संत स्वामी रामानंदजी रहते थे । उनके पास जाकर कहा कि मेरे उपर कोई जिम्मेदारी नहीं है, में अकेला ही हूँ । इसलिए मुजे संन्यास की दीक्षा दीजिए । उनके कहने का विश्वास करके रामानंदजी ने उनको दीक्षा दे दी । इसके कुछ समय बाद स्वामीजी रामेश्वर की यात्रा को निकले । संयोगवश मार्ग में विठ्ठल पंत के गांव आलंदी में ठहरे । वहां मारुति मंदिर में उन्होंने निवास किया । विठ्ठल पंत की पत्नी रुकमीबाई हररोज दर्शन करने के लिए आती थी । तदनुसार दर्शन करने आई और दर्शन करने के बाद स्वामी रामानंद के चरणोमें वंदन किया । अतः स्वामीजी ने उसे ‘‘पुत्रवती हो‘‘ ऐसा आशीर्वाद दिया । सुनकर रुकमीबाई को हँसी आ गई । स्वामीजी ने उसका कारण पूछा तो उसने कहा कि ‘‘मेरे पति ने तो काशी जाकर संन्यास ले लिया है, ऐसा मैंने सुना है । आपका आशीर्वाद सच कैसे होगा? इस विचार से ही मुझे हँसी आ गई ।‘‘ यह सुनकर स्वामीजी सोच में पड़ गये । उनकी समझ में आ गया कि विठ्ठल पंत ने उनके पास दीक्षा ली है और उन्होंने खुद उसे चैतन्याश्रम नाम दिया है । वही इस स्त्री का पति होना चाहिए । उनको चिंता हुई । स्त्री को निःसंतान दशा में छोड़कर विठ्ठल पंत ने संन्यास लिया और मैंने ही उसको संन्यास दिया यह बड़ी भूल हो गई । यह सोचकर उन्हे बहुत दुःख हुआ । रामेश्वर जाने के विचार को छोड़कर वे काशी की ओर लौट पडे । अपने साथ में रुकमाबाई और उसके पिता सिधो पंत को भी ले लिया । काशी पहुंचकर उन्होंने चैतन्याश्रम को बुलवाया और उनके पूर्वाश्रम की हकीकत पूछी और यह बता दिया कि वे स्वयं आलंदी से लौटकर आये हैं । यह सुनकर चैतन्याश्रम का शरीर ढीला पड़ गया । वे रामानंदजी के चरणोमें गिर पड़े । उसी समय सिधो पंत भी अपनी कन्या को लेकर वहां आ पहुंचे । स्वामीजी ने विठ्ठल पंत को आज्ञा दी कि अपनी पत्नी को फिर से स्वीकार करो और स्वदेश जाकर गृहस्थाश्रम का पुनः आचरण करो । गुरु की आज्ञानुसार उन्होंने आलंदी जाकर पुनः निवास किया । गुरु की आज्ञा से वे स्वधर्म को त्याग करने की ग़लती को सुधार सके । फलतः संसार को फायदा ही दुआ । पंद्रह वर्ष की आल्प आयु में ज्ञानेश्वरी जैसे अद्दभुत ग्रंथ के रचयिता सिद्ध ज्ञानी एवं योगी श्री ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ तथा सोपान और मुक्ताबाई के जीवन संसार के लिए अति मूल्यवान सिद्ध हुआ । स्वधर्म का त्याग करने से संसार का कितना अहित होता है इसे समझाने के लिए यह बात काफ़ी है ।

अतः फर्ज का त्याग उचित नहीं । जिम्मेदारी छौडकर भाग जाना ठीक नहीं । अपने को प्राप्त काम को मन लगाकर करने की ज़रुरत है । कर्तव्य का पालन करने ही में श्रेय है, उसे छोड़ने में कायरता है । कर्तव्य के पालन से ही संसार का तंत्र व्यव्स्थित रूप से चलता है । स्वधर्म की मर्यादा छोड़कर यदि सब लोग मन माना बर्ताव करे तो संसार का चक्र किस तरह चलेगा? सूर्य का धर्म उदय होकर प्रकाश देने का है । इस धर्म के पालन से उसे तथा पृथ्वी को लाभ है । इस धर्म का त्याग करके यदि सूर्य सुस्त हो जाये तो अपने लिए तो वह मृत्यु को न्योता देगा ही, साथ ही साथ संसार को भी मृत्युमय बना देगा । पृथ्वी अपनी मर्यादा में रहकर सबको धारण करती है । किन्तु यदि वह कभी भविष्य में झूठी आझादी के बहाने स्थिरता को छोड़कर हिलने लगे तो ऐसा होने पर संसार की दशा कैसी होगी? परस्पर का जो कार्य है उसका संपादन करने से ही संसार सुखी है । इसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिए । मनुष्य को हर हालत में अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए । दौड़ती रेलगाडी में एन्जिन चलानेवाला तथा विमान चालक के फ़र्ज़ की जरा कल्पना कीजिए । यदि अपनी जिम्मेदारी में वे ज़रा सा भी आलस कर दें तो कितने जीवों की जान ख़तरे में पड़ जाय? जीवन रथ में बैठे हुए हमको यह बात सदा याद रखनी चाहिए । अपने फ़र्ज़ को ईश्वर का काम समझकर पूरा करना चाहिए । इस में जीवन का कल्याण निहित है, इस में संदेह नहीं ।
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन, कर्तव्य के पालन में तू आलसी मत बन । क्षणिक आवेश में आकर तेरा धर्म क्या है, इसे मत भूल । बुध्धिपूर्वक विचार कर की तेरा स्वधर्म तुझसे क्या कहता है । स्वधर्म के पालन ही में तेरा कल्याण है ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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