Wednesday, November 25, 2020

पाप में लगने का कारण

इतने उपदेश के बाद अर्जुन पूछता है कि कभी कभी मनुष्य इच्छा न होने पर भी बलात पाप में गिरता है या दुष्कर्म करता है । इसका कारण क्या है? मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध दुष्कर्म में लगानेवाली कौनसी चीज़ है? भगवान तीसरे अध्याय के अंत में इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । सच पूछिए तो जो अर्जुन का प्रश्न है वही सबका प्रश्न है । सामान्यतः विचार करें तो यह प्रश्न कुछ लोगों के लिए सच्चा है । आध्यात्मिक मार्ग के जिज्ञासु मुझसे यह प्रश्न कभी कभी पूछ बैठते हैं । उनके लिए इसका विचार करना ज़रूरी है ।

सबसे पहले तो हम इस बात को स्पष्ट करना चाहते हैं कि मनुष्य के सारे पाप बरबस ही नहीं होते, बहुत से पाप वह स्वेच्छा से भी करता है । ज्यादातर लोग अपनी स्वेच्छा से, संपूर्णतया सावधान रहकर पाप करते हैं, उसके लिए पहले से योजना बनाते हैं तथा अवसर खोजते हैं और पाप करने में आनंद का अनुभव करते हैं । कुछ व्यक्तियों के लिए पाप करना इतना सहज हो जाता है कि बुरा कर्म करते समय उन्हें ख़याल ही नहीं आता कि कोई ग़लत काम कर रहे हैं । पाप करने के बाद उन्हें कोई पश्चाताप भी नहीं होता । उनका विवेक नष्ट हो गया, इसलिए वे अपने पापों को भी पुण्य ही समझते हैं और दूसरों को भी यही समझाने का प्रयत्न करते हैं । मनुष्य इच्छा न होने पर भी पाप कर बैठता है, ऐसा मान लेने से उसकी दुर्बलता को प्रोत्साहन मिलेगा । इसमें मनुष्य का अपमान है । यह मान्यता मानव के पुरुषार्थ के लिए लज्जास्पद है । उसकी इच्छा शक्ति तथा हिंमत पर पानी फेर देती है । अतः इसे सिद्धांत के रूप में मान लेने की जरूरत नहीं । सिद्धांतरूप से तो यही मानना चाहिए कि पाप करना या न करना यह मनुष्य के हाथ की बात है और मनुष्य यदि सोचे और प्रयत्न करे तो पाप से अपने को बचा सकता है । पाप करने या न करने में वह स्वतंत्र है । यदि उसकी इच्छा पाप करने की नहीं है तो उसको पाप में प्रेरित करने की ताकत दुनिया की किसी वस्तु में नहीं है । जीवन में देवता या दानव बनने का कार्य मनुष्य के अपने हाथ में है । पापी या पुण्यशाली बनने के लिए वह आज़ाद है । सिद्धांत की बात तो यही है और यह सत्य भी है फिर भी व्यवहारिक जीवन में कभी कभी अपवाद भी आता है । उसे पाप पसंद नहीं है फिर भी वह पाप करने के लिए प्रेरित किया जाता है । बुरा काम पसंद न होने पर भी वह उसे कर डालता है मानो बाहर की किसी प्रबल शक्ति ने उसे मजबूर किया हो । इसका कारण क्या है? ऐसे समय उसे पाप की ओर कौन ढकेलता है? महाभारत में महर्षि व्यास ने इसका उत्तर देने का प्रयास किया है । कभी कभी ऐसा देखने में आता है कि मनुष्य जिसे हितकर या करने योग्य मानता है उसमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होती है और जिसे वह अधर्म समजता है उसमें से वह निवृत्त नहीं हो पाता । दुर्योधन की दशा ऐसी ही थी । खुद अधर्म कर रहा था । पांडवो के साथ बैर रखकर अपने लिए खुद विपत्ति मोल ले रहा था । फिर भी अंतिम घडी में भी धर्म और न्याय का बर्ताव करके अपने और दुसरों का जीवन बचा लेना उसे पसंद नहीं आया । इसका कारण क्या था? इस प्रश्न का उत्तर वह स्वयं ही देता है । वह कहता है कि मेरे हृदय में बिराजमान कोई देव परमेश्वर की इच्छानुसार जो मुझसे करवाता है वही मैं करता हूँ ।

दुर्योधन के समान ही रावण की दशा भी थी । विभीषण, हनुमान, अंगद तथा मंदोदरी के बार बार समझाने पर भी रावण ने राम के साथ बैर मोल लिया । सीता ने भी शीख दी फिर भी उसने अधर्म करना जारी ही रखा । मामूली आदमियों के जीवन में भी ऐसे प्रसंग घटते हैं । किन्तु ऐसे समय यदि हम दुर्योधन के उपरोक्त शब्दों को स्वीकार कर लेते हैं तो परिस्थिति सुधरने की बजाय, और भी बिगड़ जाती है । मनुष्य के दिल में विराजमान देवों का भी देव परमात्मा उसको अधर्म अथवा पाप करने के लिए प्रेरित करता है ऐसा मानना बड़ी भूल है । परमेश्वर तो पवित्र और मंगल है तथा सत्य संकल्प है । अतः उसकी प्रेरणा भी मंगल, पवित्र और सच्ची ही होनी चाहिए और पाप की प्रेरणा उससे नहीं होती ऐसा ही मानना उचित है । अन्यथा मनुष्य जो भी काम करेगा उसकी जिम्मेदारी परमात्मा के सिर जायगी । और कुछ लोगों को पुण्य या धर्म की ओर तो कुछ को पाप या अधर्म की ओर प्रेरित करने के कारण वह बहुत पक्षपाती सिद्ध होगा । हाँ, दुर्योधन के शब्दो का विस्तृत अर्थ करने से हम मान सकते हैं कि संसार भगवान की योजना के मुताबिक चलता रहता है । मनुष्य ने जो कर्म किये हैं उनका फल ईश्वर देता है और फल को भोगना निश्चित है, अतः वह पाप और पुण्य में प्रेरित होता है । ईश्वर खुद पाप व पुण्य करवाता है, ऐसा मानना ग़लत है । दुर्योधन भी ऐसा नहीं कहता कि परमेश्वर उसे पाप में प्रेरित करता है । वह तो हृदय में बैठे हुए किसी देव का उल्लेख करता है । वही उसको पाप की ओर प्रेरित करता है । किन्तु दुर्योधन के हृदयमें क्या ईश्वर का निवास था? उसके दिल पर तो ईश्वर ने नहीं बल्कि कुटिल शैतान ने अड्डा जमा रखा था । उसके हृदयमें अधर्म का ही वास था । उसे देवता मानकर वह अपनी सफ़ाई देना चाहता है । पर सच तो यह है कि उसका तथाकथित देव शैतान था और उसी की आवाज़ सुनकर वह उसी के अनुसार चलता था । दुर्योधन की दशा तो ऐसी हो गई थी कि उसे खबर ही नहीं थी कि उसके दिल में सचमुच कौन रहता है और वहां पर किसका साम्राज्य है । किन्तु विवेकी पुरुष को इसका पता चल ही जाता है । मनुष्य चाहे कितना भी छिपाए उसके कर्म छिप नहीं सकते । मनुष्य के कर्मो के निरीक्षण से यह बड़ी आसानी से पता चल जाता है की उसको मार्गदर्शन या प्रेरणा देनेवाली शक्ति दैवी है या आसुरी । अधर्म, अनीति, अन्याय, पाखंड एवं पाप करनेवाला आदमी मोहासुर की सत्ता के वश में हो गया है और अपने में बेठे हुए तथा देवता का स्वांग भरे हुए पाप रूपी दानव के हाथ में उसने अपने जीवनरूपी रथ की लगाम दे रखी है । इस में कोई संदेह नही । इस प्रकार सोचने से दुर्योधन के शब्द का रहस्य स्पष्ट हो जाता है ।

अर्जुन समझदार था । इसलिए स्वयं उत्तर देने की बजाय वह भगवान से उत्तर की अपेक्षा रखता है । भगवान उसका क्या उत्तर देते हैं? भगवान कहते है कि मनुष्य के दिल में जो काम एवं क्रोध रूपी राक्षस है वही उसे बलात पाप में प्रेरित करता है, मानो उसकी मरजी के खिलाफ़ भी उससे कभी कभी अधर्म करवाता है । इन शब्दों का रहस्य अब आसानी से समझा जा सकता है । मनुष्य के दिल पर उसकी इच्छाओं या कामनाओं का राज्य है । यही कामनाएँ कभी कभी उसकी बुद्धि पर परदा डाल देती हैं, उसके विवेक को भुला देती है और उससे अवांछनीय कर्म करा देती हैं । कहा जाता है कि काम से मनुष्य अंधा हो जाता है । एक कहानी में एक कामी पुरुष, जो परदेश में था, अपनी प्रिया को मिलने चला । रात हो गई । रास्ते में एक नदी आई । उसमें एक शव था । उसे नाव समझकर उसने नदी पार कर ली । प्रियतमा का घर बंद था । बाहर दिवार पर सांप लटकता था । उसे रस्सी समझकर उसके द्वारा घर पर चढ़ गया और प्रिया को मिला । यह बात ज़रा विचित्र है, क्योंकि शव द्वारा नदी को पार किया जा सकता है और साप का सहारा लेकर घर पर चढ़ सकते हैं, ऐसा मानना जरा मुश्किल है । किन्तु इस कहानी से इतना ही तात्पर्य निकलता है कि कामी मनुष्य कितना अंधा और विवेकहीन हो जाता है । वह रात दिन एक ही विचार में डूबा रहता है । दुसरे लोंगो की उसे कुछ भी परवाह नहीं होती । इसी तरह लोग धन, पद और मान प्रतिष्ठा के लोभ में भी अंधे हो जाते हैं । पदार्थो में मिलावट करते हैं, नक़ली माल को असली की जगह बेचते हैं । भले बुरे धंधे करते हैं तथा अनीति का आश्रय लेते हैं । स्वार्थ वश आदमी झूठ और कपट का अवलंबन लेता है । इसी तरह क्रोध भी मनुष्य को अंधा कर देता है । क्रोध के आवेश में मनुष्य को होश नहीं रहता कि क्या बोल रहा है और क्या कर रहा है । क्रोधी आदमी भयंकर से भयंकर काम कर डालता है, खूनी भी बन बेठता है । अज्ञान के प्रभाव में आकर ही मनुष्य ऐसे काम करता है । इन विकारो का नियंत्रण करने की आवश्यकता है । तभी यह जीवन सफल होगा ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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