Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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जीवन के कुछ क्षण शकवर्ती होते है, जिसे हम चाहकर भी नहीं भूल सकते । १४ अक्तूबर १९४७, भाद्रपद के अमावास्या की रात मेरे लिये वैसी-ही थी । आज-भी उसे याद करते हुए मेरे रोंगटे खडे हो जाते है ।

उस दिन मैं शांताश्रम के उपर के कमरे में बैठा था । कमरे की दीवार पर भगवान राम, श्रीकृष्ण, हनुमान, बुद्ध, रामकृष्णदेव तथा विवेकानंद की तसवीरें थी । उनके दर्शन करते हुए मैं खयालो में खो गया था । सोचने लगा की पीछले ढाई साल की निरंतर कोशीश के बावजूद मैं साधना का वो मुकाम हासिल नहीं कर पाया जिसकी मुझे तलाश है । अब क्या करुँ जिससे मैं अपनी मंझिल पा सकूँ । भरी जवानी में, सबकुछ छोडकर मैंने हिमालय की राह पकडी थी । क्या मेरा जीवन एक अज्ञात प्रवासी की भाँति चलते-चलते ही खत्म हो जायेगा या मैं पूर्णता के अपने गंतव्यस्थान पर पहूँच पाउँगा ? अगर हाँ तो इसके लिये मुझे और कितना इन्तजार करना होना ? अभी तक तो एसा नहीं हुआ की किसीने अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया और उसे सफलता न मिली हो । मुझे यकीन था की मैं बहुत जल्दी अपने मकसद में कामियाब हूँगा । चाहे मार्ग में रुकावट आयें, चाहें थोडा वक्त लगे, मगर मैं उसे पाकर रहूँगा ।

हे माँ, मेरी तपस्या से तुम वाकिफ हो । ये गंगा मैया, ये पैड-पौधे, ये पर्वत की चोटीयाँ उसके साक्षी है । मैं यहाँ अकेला रहकर, सब कुछ बर्दाश्त कर रहा हूँ । मगर एसा कब तक चलेगा ? कब होगा मुझे आपका दर्शन ? माँ, मेरे गुण-अवगुण को मत देखो । मैं तो आपका बालक हूँ, आप मेरे मातापिता है, सर्वस्व है । मेरी तकलीफ देखकर मुझ पर कृपा करो । आप ऐसे क्यूँ बैठे हो ? जल्दी से आकर मुझे अपने दर्शन दो ।

प्रार्थना करते-करते मैं भावुक हो गया, आँखो से अश्रु बहने लगे । तब एसा अनुभव हुआ, मानो कोई कह रहा है, 'माँ जगदंबा तेरी इष्ट है । किसी और के आगे हाथ फैलाने के बजाय माँ को अपने मन की बात बता । वही तेरे लिये सबकुछ करेगी । माँ की कृपा के अलावा तुझे कहीं चैन या करार नहीं मिलेगा । कल से नवरात्री शुरु हो रही है । पूर्वजन्म की तरह इस बार भी माँ की प्रसन्नता के लिये साधना कर । माँ तुझ पर अवश्य कृपा करेगी, तुझे मंझिल तक पहूँचायेगी ।'

मेरे तन-मन-अंतर में, अणु-परमाणु में एक नया उत्साह, नया जोश आया । मेरी सभी दुविधाओं का अंत हुआ । जो कुछ सुनाई पडा, मैंने बेझीझक स्वीकार किया । मुझे नयी हिंमत और आनंद का अनुभव हुआ । मुझे लगा की माँ जगदंबा ने मेरी प्रार्थना सुनकर अपनी कृपा के द्वार खोल दिये है । ये बात अगर पहले बताई होती तो ? मगर जो भी होता है, जब भी होता है, भले के लिये होता है । माँ जो भी करती है, ठीक ही करती है । चौदह-पंद्रह साल की आयु में माँ के दर्शन की लगनी लगी थी । मगर हिमालय में आकर योगाभ्यास और कुछ और बातें मन पर हावी हो गइ । सन १९४३ में ऋषिकेश में मिले त्रिकालज्ञ महात्मा के शब्द याद आये । उन्होंने कहा था की जब तक माँ जगदंबा को ईष्ट मानकर साधना नहीं करेगा, तुझे शांति नहीं मिलेगी । अब सबकुछ स्पष्ट हो गया । अब मुझे क्या करना चाहिये ये मेरी समज में आ गया । अब मुझे केवल माँ की कृपा का प्रार्थी बनना था, उन्हीं के लिये तडपना था ।

रात काफि हो चुकी थी । दीया जलाकर मैंने अपनी डायरी में लिखा, 'हे मा, जब तक आपकी पूर्ण कृपा मुझ पर नहीं होती, मैं कहीं नहीं जाउँगा । मैं खाना नहीं खाउँगा, उपवास करूँगा, आपकी प्रसन्नता के लिये जो हो सकता है, करूँगा ।'

मेरी इस बात को कोई गलत रीत-से मत लेना । ये कोई हठ या जीद्द नहीं थी । ये तो माँ के प्रति मेरे अगाध स्नेह का परिणाम था । मेरा यह स्वभाव रहा है की जब तक मैं निर्धारीत लक्ष्य की प्राप्ति न कर लूँ, मुझे चैन-ओ-आराम नहीं होता । यहाँ तक की खाना-पीना, कुछ-भी करना नहीं भाता । मुझे यकीन था की माँ के लिये इस तरह तडपने से वह जरूर दर्शन देगी । उसे आना ही पडेगा । मेरा और उसका संबंध पूर्वजन्म का है । अगर साधारण आदमी किसी के लिये खानापीना छोड देता है तो वो आदमी उसके लिये भागा चला आता है । माँ तो सारे संसार की जननी है । अगर मैं उसके दर्शन किये बिना रह नहीं सकता, मुझे जीना बेकार लगता है, तो वो क्यूँ नहीं आयेगी ? वो करुणामयी है, जो उसे सच्चे दिले से प्यार करता है, जो उसकी शरण में आता है, उसके उपर उसकी कृपा अवश्य होती है ।

दुन्यवी कामनाओं तथा लौकिक लाभालाभ के लिये मनुष्य घडे भरकर आँसू बहाता है, मगर ईश्वर के लिये, पूर्णता, परमशांति और मुक्ति के लिये एसा नहीं करता, उसे सच्चे दिल-से नहीं पुकारता । रामनाम से पथ्थर तैर गये, तो भवसागर पार करना कौन-सी बडी बात है । हे मानव, तू ईश्वर की प्रसन्नता के लिये कोशीश कर, उसकी कृपा की कामना कर । वो तुझे बंधनमुक्त और सुखी करेगा ।

देश, दुनिया और साधना के विचारों में मेरा मन डूब गया । मेरा हृदय रोता रहा । मैंने दीपक बुझा दिया और ध्यान करने बैठा । उस रात दिल में जो तूफान उठा था उसको मैं बयाँ नहीं कर सकता । वो मेरे जीवन की अमर रात थी ।

डायरी में लिखे मेरे शब्दों से शायद आपको अंदाजा हो इसलिये यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :
'पूर्णता, आत्मशांति, भारत और सारे संसार के कल्याण हेतु साधनायज्ञ । कार्यम् साधयामि वा देहम् पातयामि ।'
'फिर वही बात । पूर्णता के लिये अंतर के अंतरतम से पुकार । भारत की सांप्रत परिस्थिति से व्यथित होकर फिर वही चित्कार । न जाने कितने लम्हों से यह होता आया है और अब भी जारी है ... भले-ही आपने उसे नहीं सुना मगर अब मैं पीछे मुडनेवाला नहीं हूँ । जब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो जाता, मैं कोशीश जारी रखूँगा । फिर चाहे इसमें मेरी जान क्यूँ न चली जाय । माँ, मुझे आशीर्वाद दो की मैं देश-दुनिया के भले के लिये काम आ सकूँ । मेरे प्रयत्नों को आपके शुभाशीर्वाद की जरूरत है । मुझे आशा है की आप मेरी अरजी को शीघ्रातिशीध्र मान्य करोगे । तुम्हारी भक्तवत्सलता का सबूत दोगे । भारत के प्रति अपने लगाव का प्रमाण दोगे । आज १४ अक्तूबर १९४७ और मंगलवार है । कल से नवरात्री का प्रारंभ हो रहा है । आज रात्री से, इसी प्रहर से मैं अनशन व्रत का प्रारंभ कर रहा हूँ । मेरे इस संनिष्ट प्रयास में मेरे साथ रहना, मुझे ताकत देना ।'